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बुधवार, 23 सितंबर 2009

जब सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी

दसवीं कक्षा में आने तक कभी सिनेमाघर में फिल्म नहीं देखी थी उससे पहले नागौर जिले के मोलासर कस्बे में भरने वाले हिंडोला नामक मेले में प्रोजेक्टर के माध्यम से परदे पर खुले मैदान में दिखाई जाने वाली फिल्मे ही देख पाए था मेले में शहीदों पर व देश भक्ति की कई फिल्मे फ्री में दिखाई जाती थी मेले का प्रबंधन मोलासर निवासी प्रसिद्ध ओद्योगिक सोमानी परिवार द्वारा किया जाता है | चचेरा भाई हनुमान सिंह फिल्मो व फ़िल्मी गानों का शौकीन था उसने उस वक्त तक कई फिल्मे भी देख रखी थी वह अक्सर हमें फिल्मो की कहानियां व सिनेमाघरों के बारे में बताया करता था इस मामले में हम अपने आप को उसके सामने निरा बुद्दू ही समझते थे साथ ही हनुमान सिंह की प्रतिभा के कायल थे कि कैसे ये तीन तीन घंटे की पूरी फिल्मो की कहानी और डायलोग याद कर लेता है जबकि हमें तो एक प्रश्न का उत्तर याद करने के लिए कितनी रटत लगानी पड़ती है | हनुमान से फिल्मो की कहानियां व सिनेमाघरों की बाते सुनकर सिनेमाघर में फिल्म देखने की बड़ी जिज्ञासा होती थी |
आखिर दसवी कक्षा में पढ़ते समय ही हमें जीवन में पहली बार सिनेमाघर में फिल्म देखने का सोभाग्य प्राप्त हुआ और वह भी जयपुर के विश्व प्रसिद्ध सिनेमाघर " राजमंदिर सिनेमाघर " में | दसवी कक्षा में पढ़ते समय हमारी सरकारी स्कूल " राजकीय माध्यमिक विद्यालय ,खूड " के शिक्षकों ने हमें शेक्षणिक भ्रमण पर ले जाने का दो दिवसीय कार्यक्रम बनाया | कार्यक्रम के अनुसार हमारा दल खूड कस्बे से रवाना होकर सुबह अजमेर पहुंचा जहाँ दिन भर अजमेर भ्रमण के बाद हम शाम को तीर्थ राज पुष्कर पहुंचे | रात्री विश्राम के बाद सुबह पुष्कर सरोवर में स्नान कर ब्रह्मा मंदिर सहित अन्य मंदिरों के दर्शन कर हम जयपुर पहुंचे | दिन भर जयपुर आमेर आदि के दर्शन करने के बाद हमें रात ९ बजे राजमंदिर सिनेमाघर में फिल्म दिखाने के कार्यक्रम के तहत हमें राजमंदिर सिनेमाघर ले जाया गया | जीवन में पहली बार सिनेमाघर और वो भी प्रसिद्ध राजमंदिर में फिल्म देखने की उत्सुकता व रोमांच का जो अहसास उस वक्त हो रहा था उसे तो में सिर्फ महसूस ही कर सकता हूँ शब्दों में बयान नहीं कर सकता | लेकिन उस रोमांच के साथ मन में एक शंका भी उथल पुथल मचा रही थी क्योकि हनुमान ने बताया था कि राजमंदिर सिनेमाघर में ऐसे गलीचे बिछे है जिन पर पैर रखते ही पैर आधा फीट गलीचे के अन्दर धंस जाता है और समझो ध्यान नहीं रखा तो वहीँ धडाम | हालाँकि गलीचे पर गिरने से चोट तो नहीं लगेगी पर फजीहत तो होगी ही ना | उसने कुर्सियों के बारे में भी बताया कि बैठते ही फेल जाती है वहां भी धडाम होने से बचने हेतु सावधानी बरतनी पड़ती है |
गुरुजन साथ थे तो हमें अनुशासन में तो रहना ही था अतः सभी छात्रों ने एक लाइन बना सिनेमाघर में घुसने के लिए कदम बढाये | सिनेमाघर में घुसते ही वहां बिछे शानदार गलीचे पर बड़े संभल कर हमने कदम रखे कि हनुमान ने जो बता रखा था वो ना हो जाय यही नहीं सीट पर बैठते समय भी पूरी सावधानी बरती ! कही धडाम ना हो जाये और पूरी क्लास जिसमे होसियार बनते थे के सामने कहीं फजीहत ना हो जाये | खैर सीट पर बैठते ही फिल्म " सावन को आने दो " शुरू हो गयी | कब तीन घंटे बीते और कब फिल्म पूरी हो गयी पता ही नहीं चला | जब राजमंदिर सिनेमाघर से बाहर निकले तो अपने आप पर बड़ा फक्र हो रहा था आखिर हमने अपने जीवन में फिल्म देखने की शुरुआत राजमंदिर जैसे विश्व प्रसिद्ध सिनेमाघर से जो की थी | ;

3 टिप्पणियाँ:

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

bahut badhiya, aapki pahli FILM hi RAJMANDIR me aur hamne abhi tak use dekha hi nahin.
kabhi Jaypur jana hi nahin huaa.

Dr. Jitendra Bagria ने कहा…

ekdum sach baat kahi hai sir ji ne....
waise shekhawati jyadatar janta ne apni pahli movies jaipur mein school trip ke time pe hi dekhi hai..
coz hamesha se rajmandir mein movie dekhna trip ka part hota tha....
thanx

Dr. Jitendra Bagria ने कहा…

i want to post here .. how it comes possible ?