तिल उपयोगी होते हैं लेकिन जब कोई तिल तिल करके मार रहा हो तब तिल की उपयोगिता ? दर्द के साथ मिलीभगत दर्द तिल तिल करके भी बहुत दर्द देता है दर्द तो तिल भर भी समंदर होता है.
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मंगलवार, 21 फरवरी 2012
रविवार, 19 फरवरी 2012
पहली बार मतदान का एहसास बड़ा मीठा-मीठा
प्रस्तुतकर्ता Mousmi पर 10:15 pm 0 टिप्पणियाँ
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अनुभव,
पहला एहसास,
मतदान
रविवार, 1 जनवरी 2012
नववर्ष की मंगलकामनाएं
नया वर्ष आ गया; वर्ष 2012 आ गया; पुराना वर्ष 2011 चला गया। इस समय समाचारों में लोगों का उत्साह दिखाया जा रहा है। घर के कमरे में बैठे-बैठे हमें यहां उरई में खुशी में फोड़े जा रहे पटाखों का शोर सुनाई दे रहा है। लोगों की खुशी को कम नहीं करना चाहते, हमारे कम करने से होगी भी नहीं।
कई सवाल बहुत पहले से हमारे मन में नये वर्ष के आने पर, लोगों के अति-उत्साह को देखकर उठते थे कि इतनी खुशी, उल्लास किसलिए? पटाखों का फोड़ना किसलिए? रात-रात भर पार्टियों का आयोजन और हजारों-लाखों रुपयों की बर्बादी किसलिए? कहीं इस कारण से तो नहीं कि इस वर्ष हम आतंकवाद की चपेट में नहीं आये? कहीं इस कारण तो नहीं कि हम किसी दुर्घटना के शिकार नहीं हुए? कहीं इस कारण तो नहीं कि हमें पूरे वर्ष सम्पन्नता, सुख मिलता रहा?
इसके बाद भी नववर्ष के आने से यह एहसास हो रहा है कि बुरे दिन वर्ष 2011 के साथ चले गये हैं और नववर्ष अपने साथ बहुत कुछ नया लेकर ही आयेगा। देशवासियों को सुख-समृद्धि-सफलता-सुरक्षा आदि-आदि सब कुछ मिले। संसाधनों की उपलब्धता रहे, आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे।
कामना यह भी है कि इस वर्ष में बच्चियां अजन्मी न रहें; कामना यह भी है कि महिलाओं को खौफ के साये में न जीना पड़े; कामना यह भी है कैरियर के दबाव में हमारे नौनिहालों को मौत को गले लगाने को मजबूर न होना पड़े; कामना यह भी कि कृषि प्रधान देश में किसानों को आत्महत्या करने जैसे कदम न उठाने पड़ें; कामना यह भी कि भ्रष्टाचारियों की कोई नई नस्ल पैदा न होने पाये और पुरानी नस्ल का विकास न होने पाये....कितना-कितना है कामना करने के लिए....नये वर्ष के साथ होने के लिए।
आइये चन्द लम्हों के आयोजन में हजारों-लाखों रुपयों की बर्बादी कर देने के साथ-साथ इस पर भी विचार करें। इस विचार के साथ ही आप सभी को नव वर्ष की शुभकामनायें...कामना है कि आप सभी को ये वर्ष 2012 सुख-सम्पदा-सुरक्षा-सम्पन्नता-सुकून से भरा मिले।
प्रस्तुतकर्ता डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर पर 11:46 am 0 टिप्पणियाँ
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नववर्ष,
शुभकामनायें
रविवार, 11 सितम्बर 2011
आक्रोश के पीछे से छलकता तिरंगे के प्रति सम्मान
अन्ना की आंधी में जिस समय पूरा देश बहा जा रहा था उस समय इस पोस्ट को लगाना बेहतर नहीं समझा था। इस पोस्ट में अन्ना या उनकी टीम के प्रति किसी प्रकार की विरोधी बातें नहीं हैं वरन् उस आन्दोलन जैसे परिदृश्य में एक छोटी सी बालिका के भावों का सम्मिश्रण है।
सम्पूर्ण देश की तरह उरई में भी अन्ना के स्वर से स्वर मिला कर नगरवासी अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे थे। अनशन समाप्ति वाले दिन भी सभी के चेहरे पर एक प्रकार की खुशी, एक अलग तरह का उत्साह देखने को मिल रहा था। क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बुजुर्ग सभी अपनी ही धुन में मस्त थे। उरई में लगातार बारह दिनों से चल रहे अनशन, धरने के समाप्त होने के समय गांधी चबूतरे पर सभी उत्साहीजन एकत्र होकर आगे की रणनीति पर विचार करने के साथ-साथ एक दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, मुंह मीठा करवा रहे थे।
उत्साह में तिरंगा आसमान को छू रहा था। बच्चे भी अपनी लम्बाई से दो-चार गुने लम्बे झंडे लेकर उत्साह में झूम रहे थे। चार बच्चे ऐसे थे जो पहले दिन से ही बराबर धरनास्थल पर रहते थे और पूरे जोश के साथ अपनी उपस्थिति को दर्ज करवाते थे। उनकी उम्र में सम्भवतः बच्चों को पता ही नहीं होता है कि धरना क्या है, अनशन क्यों किया जाता है, भ्रष्टाचार क्या है, अन्ना और सरकार के बीच का टकराव क्या है पर फिर भी वे चारों बच्चे अपने पूर्ण भोलेपन के साथ हमारे आन्दोलन का हिस्सा बनते।
उनकी मासूमियत का दृश्य इस आन्दोलन के अन्तिम दिन दिखा। खुशी से झूमते लोगों के साथ नाचते-थिरकते बच्चों के साथ उछलती-कूदती बच्ची एकाएक चिल्ला पड़ती है-‘‘हाय दइया.........।’’ हम लोगों ने घबराकर, चौंककर उसकी तरफ देखा। उसकी पूरी बात को सुनकर एकदम से हंसी छूट गई। उस बच्ची ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ झंडा एकदम छोड़कर चिल्लाई-‘‘हाय दइया, जो तो कांग्रेस को झंडा है, जो तिरंगा नईंयां।’’
दरअसल उसके हाथ में जो तिरंगा था उसमें सफेद पट्टी में अशोक चक्र नहीं बना हुआ था और उस मासूम को तो यही पता था कि जिस तिरंगे की सफेद पट्टी में नीला अशोक चक्र बना हो वही तिरंगा ध्वज है। उसको समझाकर उसके हाथों में उस तिरंगे को थमाया और वह बच्ची भी बात को समझकर पुनः उसी जोश में भारत माता की जय, इंकलाब जिन्दाबाद करने में अपने साथियों के साथ लग गई। इधर हम मित्र इस बात पर विचार करने लगे कि यदि बच्चों में राजनैतिक दलों के प्रति इस तरह की भावना है तो अब वाकई देश में राजनैतिक सुधारों की आवश्यकता है; घनघोर आवश्यकता है।
प्रस्तुतकर्ता डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर पर 10:56 am 0 टिप्पणियाँ
बृहस्पतिवार, 14 अप्रैल 2011
बांधवगढ की सैर और शेर के दर्शन....
दो साल पहले ,मई में अचानक ही राजा (डॉ.सुजीत शुक्ल ) का फोन आया, बांधवगढ़ चलना है. मैंने कहा की मई में तो मेरे "ग्रीष्मकालीन भ्रमण कार्यक्रम" तय हैं. रिज़र्वेशन भी हो चुके हैं. राजा बोला " चलो, जून में चलते हैं. लेकिन इसके आगे नहीं. अपने कार्यक्रम १० जून तक समेट लो, भैया से भी बोलो छुट्टियां तैयार रखें. कोई बहाना नहीं. "
अधिकार सहित दिए गए इस आदेश की अवहेलना संभव थी क्या? अपने डेढ़ महीने के कार्यक्रम को एक महीने में समेटा और १० जून को वापस आ गए, सतना. ११ जून को राजा ,और मेरी बुआ सास (राजा की मम्मी) मुंबई से सतना पहुँच गए. अगले दिन हमें बांधवगढ़ के लिए बड़े सबेरे निकलना था.
सुबह १० बजे हम बांधव गढ़ पहुंचे. राजा ने पहले ही सत्येन्द्र जी के रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. हम सीधे वहीं पहुंचे.
ये रिसोर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहाँ से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता. लगता है कि हम बीच जंगल में हैं. अलग-अलग बने खूबसूरत कॉटेज घाना बगीचा, आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटके बड़े-बड़े असंख्य आम...अनारों से लादे वृक्ष...बहुत सुन्दर स्थान. मन खुश हो गया. देर तक सत्येन्द्र जी और के दोनों ही हमारे साथ गप्पें करते रहे. लंच के बाद सत्येन्द्र जी ही हमें नेशनल पार्क कि पहली साइटिंग पर ले गए. और जंगल के बारे में अमां जानकारियां दिन. अद्भुत ज्ञान है उन्हें जंगल और जंगली जीवों का. पहले दिन तो हम जंगल कि खूबसूरती ही देखते रह गए...हिरन और चीतल जैसे जानवर भी मिले. शेर के पंजों के निशान भी मिले...... इतने घने जंगल............क्या कहें...
दूसरे दिन सुबह चार बजे हम उठ गए और साढे चार बजे जंगल कि तरफ अपनी सफारी में निकल लिए. किस्मत अच्छी थी............दो राउंड के बाद ही शेर के दर्शन हो गए.
नहीं.....ये बिल्ली नहीं है.....गुर्राहट और तेज़ हो गई.... अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम....जंगल से लगा हुआ रिसोर्ट...हदबंदी के लिये बाड तक नहीं.....हम सब तो थे ही, मेरी भांजी भी साथ में....हे ईश्वर!!! दौड के दोनों बच्चों को किचन में बंद किया. अब सारे वेटर भी डरे हुए....बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां...... पिछले दिनों एक लडके को खा गया था.... काटो तो खून नहीं.......टेबल पर जस का तस पडा खाना..... हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई. कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था. खैर....धीरे-धीरे उतरे.... एक-दूसरे का हाथ पकडे किसी प्रकार कौटेज़ तक पहुंचे. आह.... सुकून की लम्बी सांस...... पूरी रात आंखों में कटी. सबेरे जब हम फिर साइटिंग के लिये पहंचे- लोगों को कहते सुना- रात बोखा( मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़ आया था!!!!!!!!!!
प्रस्तुतकर्ता वन्दना अवस्थी दुबे पर 5:28 pm 8 टिप्पणियाँ
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नेशनल पार्क,
शेर
रविवार, 3 अप्रैल 2011
बजा क्रिकेट में भारत का डंका ।
हार गयी वर्ल्ड कप में लंका ,
बजा क्रिकेट में भारत का डंका ।
मैच फायनल, था क्या हाल ?
अंतिम क्षण तक मन बेहाल ।
सबका रहा धड़कता दिल ,
जबतक जीत गयी नहीं मिल।
सबने अच्छी क्रिकेट खेली ,
सबकी अपनी-अपनी शैली ।
पलड़ा कभी, किसी का झुकता,
हर दर्शक का ह्रदय उछलता ।
जब हुए सहवाग,सचिन आउट ,
लगा जीत में अब है डाउट ।
गौतम निकले अति गंभीर,
भारत की अच्छी तक़दीर ।
था विराट का सुखद प्रयास ,
जिससे बधीं जीत की आस ।
फिर धोनी की सुन्दर पारी ,
जिससे बिखरीं खुशिया सारी ।
किया बालरों ने भी कमाल ,
फील्डिंग से रहे विरोधी बेहाल ।
वर्ष अठाईस का इंतजार ,
ख़त्म किया कैप्टन ने छक्का मार।
सर्वश्रेष्ठ अपना युवराज ,
हर भारतवासी को नाज ।
हुईं ख़ुशी से आँखें नम ,
आखिर जीते वर्ल्ड कप हम ।
रूप कोई भी हो क्रिकेट का ,
भारत अब है नंबर वन ।
प्रस्तुतकर्ता Dr.Aditya Kumar पर 1:43 pm 1 टिप्पणियाँ
सोमवार, 21 मार्च 2011
भांग की मस्ती और रेलवे स्टेशन का हुडदंग
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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हॉस्टल का माहौल एकदम पारिवारिकता से भरपूर था। हम सभी छात्रों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं था। पहला ही साल था और हम सभी मिलकर दीपावली, दशहरा आदि अपने-अपने घरों में मनाने के पहले हॉस्टल में एकसाथ मना लिया करते थे। इसी विचार के साथ कि होली भी घर जाने के पहले हॉस्टल में मना ली जायेगी सभी कुछ न कुछ प्लानिंग करने में लगे थे।
हम कुछ लोगों का एक ग्रुप इस तरह का था जो हॉस्टल की व्यवस्था में कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहा करता था। इसी कारण से उन दिनों हॉस्टल की कैंटीन की जिम्मेवारी हम सदस्यों पर ही थी। होली की छुट्टियां होने के ठीक दो-तीन दिन पहले रविवार था। रविवार इस कारण से हम हॉस्टल वालों के लिए विशेष हुआ करता था कि उस दिन एक समय-दोपहर का- भोजन बना करता था, खाना बनाने वाले को रात के खाने का अवकाश दिया जाता था। रविवार को पूड़ी, सब्जी, खीर, रायता आदि बना करता था। हम सदस्यों ने सोचा कि कुछ अलग तरह से इस दिन का मजा लिया जाये।
हमारी इस सोच में और तड़का इससे और लग गया जब पता चला कि हॉस्टल के बहुत से छात्र उसी रविवार को अपने-अपने घर जा रहे हैं। रविवार के भोजन को खास बनाने की योजना हम दोस्तों तक रही और अन्य सभी छात्रों के साथ आम सहमति बनी कि होली इसी रविवार को खेली जायेगी, उसके बाद ही जिसको घर जाना है वो जायेगा।
हम दोस्तों ने अपनी योजना के मुताबिक उस दिन खाने में खीर में खूब सारी भांग मिलवा दी। इस बात की चर्चा किसी से भी नहीं की। सभी ने मिलकर खाना खाया और हम दोस्तों ने सभी को खूब छक कर खीर खिलवाई। मीठे के साथ भांग का नशा और उस पर होली की हुड़दंग का सुरूर....हॉस्टल के सभी छात्रों पर तो जैसे मस्ती खुद आकर विराज गई हो। खूब दम से होली खेली जाने लगी, टेप चलाकर गानों के साथ नाच भी शुरू हुआ। किसी के बीच सीनियर-जूनियर जैसी बात नहीं दिख रही थी।
इसी बीच कुछ छात्र जो होली नहीं खेलना चाहते थे और उन्हें घर भी जाना था, सो उन्होंने खीर भी इतनी नहीं खाई थी कि नशा उनको अपने वश में करता। ऐसे लगभग पांच-छह छात्रों ने हॉस्टल की दीवार फांदकर रेलवे स्टेशन की ओर भागना शुरू किया। उनके दीवार फांदने का कारण ये था कि हम सभी रंगों से भरी बाल्टी आदि लेकर दरवाजे पर ही बैठे थे कि कोई भी बिना रंगे घर न जा पाये। इस बीच उनका भागना हुआ और हम लोगों को भनक लग गई कि कुछ लोग जो हमारी इस होली में साथ नहीं हैं वे पीछे से भाग गये। बस फिर क्या था, होली का हुड़दंग सिर पर चढ़ा हुआ था, भांग का नशा अपनी मस्ती दिखा ही रहा था, हम सभी जो जिस तरह से बैठा था वैसे ही रेलवे स्टेशन की तरफ दौड़ पड़ा।
कोई नंगे पैर तो कोई एक पैर में चप्पल-एक पैर में जूता बिधाये; कोई शर्ट तो पहने है पर पैंट गायब तो कोई नंगे बदन दौड़े ही जा रहा था। और तो और क्योंकि उन्हें रंगना भी था जो बिना रंगे निकल पड़े थे तो हाथों में रंगों से भरी बाल्टी भी लिये सड़क पर दौड़ चल रही थी। आप सोचिए कि बिना होली आये, होली जैसी मस्ती को धारण किये एकसाथ लगभग 20-25 लड़के बिना किसी की परवाह किये बस सड़क पर दौड़े चले जा रहे थे। लगभग चार-पांच किमी की दौड़ लगाने के बाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हुरियारों की टोली पहुंच ही गई, वे भी बरामद हो गये जिनको रंगना था। बस फिर क्या था चालू हो गई होली रेलवे स्टेशन पर ही।
मस्ती का मूड, भांग का सुरूर, अपने साथियों को रंगने के बाद अपनी तरह के ही कुछ मस्ती के दीवाने यात्रियों को रंगना शुरू किया। कुछ देर का हुल्लड़ देखने के बाद प्लेटफॉर्म पर बनी चौकी के सिपाहियों ने आकर दिखाये दो-दो हाथ तो रंगीन हाथ उनके साथ भी हो गये पर बाद में डर के मारे सभी वापस हॉस्टल लौट पड़े। हद तो तब हो गई जबकि भांग का नशा तो दूसरे दिन दोपहर तक उतर गया किन्तु सिर का भारीपन दो दिनों तक रहा। इसी भारीपन में नीबू चूस-चूस कर अपनी प्रयोगात्मक परीक्षा दी, जो सोमवार को सुबह सम्पन्न हुई। चूंकि हमारी रेल्वे स्टेशन की होली की खबर हमारे हॉस्टल वार्डन के पास तक आ चुकी थी तो सभी प्रोफेसर्स को पता था कि हम लोग किस मस्ती के साथ प्रयोगात्मक परीक्षा दे रहे हैं। यह तो भला हो उन सभी गुरुजनों का जिन्होंने पूरे सहयोग के साथ हमारी होली के आनन्द और प्रयोगात्मक परीक्षा के बीच संतुलन बिठा दिया।
आज भी कभी-कभी होली में भांग का स्वाद लेने का प्रयास किया जाता है तो हॉस्टल की होली और रेलवे स्टेशन का हुड़दंग याद आये बिना नहीं रहता है।
प्रस्तुतकर्ता डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर पर 11:16 am 0 टिप्पणियाँ



