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बुधवार, 2 सितंबर 2009

बहुत डरते डरते बना ब्लॉग और लिखी पोस्ट


पहली बार की घटनाओं का एक मीठा सा एहसास सभी को हो यही सोच कर इस ब्लाग को प्रारम्भ किया है। अब चूँकि बात ब्लाग की हो रही है तो सोचा कि क्यों न अपने पहली बार ब्लाग पर आने के बारे में आप लोगों से बात की जाये।
घर पर इंटरनेट कनेक्शन लिए लगभग पाँच माह होने को आ गये थे। अपने काम की कुछ साइट पर घूमने के साथ साथ ऐसी साइट भी देखा करते थे जिन पर अपने लेख, कविता, कहानी आदि को भेज कर प्रकाशित करवा सकें।
किसी भी लेखक के लिए छपास रोग बहुत ही विकट रोग है। हमारे ख्याल से वे दिन तो हवा हो गये जब लोग स्वान्तः सुखाय के लिए लिखा करते थे। अब तो छपास रोग के कारण लिखना पड़ता है। यही छपास रोग हममें भी था पर शायद इसकी बहुत हद तक पूर्ति इस रूप में हो चुकी थी कि माँ सरस्वती, अपनी लेखनी और बड़ों के आशीर्वाद से उस समय से ही छपना शुरू हो गये थे जब हमें बच्चा कहा जाता था। उम्र रही होगी कोई नौ वर्ष की। तबसे कागज पर तो छपते रहे।
अब घर में इंटरनेट और लेखन भी होता हो तो छपास का कीड़ा दूसरे रूप में कुलबुलाया। बहुत खोजबीन की पर समझ नहीं आया कि इंटरनेट पर इस रोग का निदान कैसे हो? खोजी प्रवृति ने हिन्दी खोज के दौरान यह तो दिखाया कि बहुत से लोग हिन्दी में अपने मन का विषय लिखते दिख रहे हैं पर कैसे यह समझ से परे था?
एक दिन टीवी पर एक कार्यक्रम आ रहा था जिस पर चर्चा हो रही थी ब्लाग से स्म्बन्धित। बस दिमाग ने क्लिक से इस शब्द को पकड़ा। इससे पहले अमिताभ बच्चन के ब्लाग की बातें सुनते रहते थे बिगअड्डा पर जाकर पंजीकरण न करवाया। अब ब्लाग की बातें सुनी जो बनाने को लगकर तो नहीं पर सेलीब्रिटी को लेकर हो रहीं थीं।
तुरन्त कम्प्यूटर आन किया, गूगल पर जाकर सर्च किया Create Blog। अब एक दो हों तो समझ में भी आये, वहाँ तो ढेरों साइट। न समझ आये कि इसमें बनाना है, न समझ में आये कि उसमें बनाना है। इसके अलावा डर कि कहीं हमें पेमेंट न करना पड़े? हालांकि मालूम था कि आज की दुनिया में कोई चीज बिना पेमेंट के नहीं मिलती है, यदि कहीं पेमेंट के लिए क्रेडिट कार्ड वगैरह का नम्बर माँगा तो साइट बंद कर देंगे।
चक्कर था मुफत का तो फिर सर्च किया Create Free Blog। अब भी वही समस्या कहाँ जायें? दिमाग पर जोर डाल कर देखा तो बहुत सी साइट के एड्रेस पर या तो ब्लागपोस्ट लिखा मिला या फिर वर्डप्रैस। बस हिम्मत करके ब्लागर पर गये और ब्लाग बना डाला। इसके बाद भी वही ठेंठ भारतीय अंदाज कि मुफत में मिले तो दो दे दो। हमने वर्डप्रेस पर भी ब्लाग बना दिया।
अब दोनों जगह ब्लाग बन गये पर पोस्ट कहीं नहीं किया। दोनों जगह जाकर देखा पर हिम्मत नहीं हुई कुछ भी पोस्ट करने की। सोचा कहीं पोस्ट करने के बाद कोई पंजीकरण की कोई शर्त न हो, आज के जैसी किसी स्टार के निशान के नीचे छिपी हुई।
इतने के बाद अपने एक मित्र को फोन किया, अपने भाई को फोन किया। पूरी तरह से आश्वस्ति के बाद हमने अपनी पहली पोस्ट लिखी। अब यह भी समस्या थी कि इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ेंगे कैसे?
अब यह समस्या कैसे सुलझी यह बाद में क्योंकि यह भी कुछ न कुछ पहली बार करने जैसा ही मजेदार था।

3 टिप्पणियाँ:

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

हमने वेब साईट बनाने के चक्कर में ब्लॉग बना तो लिया था लेकिन साल भर पता ही नहीं चला कि इसे पढने वाले कहाँ से आयेंगे वो तो सर्च करते हुए एक दिन बच्चो को चिट्ठाजगत मिल गया तब जाकर असल ब्लोगिंग का पता चला | रही सही कसर समीर जी की पहली टिप्पणी ने पूरी करदी |

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत ही रोचक वर्णन किया है आपने....पढकर मजा आया.....

अनूप शुक्ल ने कहा…

पढ़ने की समस्या नहीं जी बस लिखते रहिये।