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शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

कार चलाना सीखा बिना किसी सहारे के

दीपावली के समय की बात है, आज से लगभग 12-13 वर्ष पहले। हमारे चाचाजी उस समय ग्वालियर में थे और अपनी कार से आये थे। उन्होंने उस समय कार नई-नई खरीदी थी। तब तक हमें कार चलानी नहीं आती थी। घर में पहली कार भी वही थी। अपनी पढ़ाई के दौरान ग्वालियर में कई दोस्तों के घर में कार थी पर सोचा करते थे कि जब अपने घर में कार आयेगी तभी चलाना सीखेंगे।
त्यौहारों पर सभी चाचा लोग यहाँ उरई में इकट्ठा होकर उन्हें हँसी-खुशी से मनाते हैं। अब माहौल भी उमंग भरा था और घर में कार भी खड़ी थी। हमने चाचा से कार सिखाने के लिए कहा तो चाचा ने कहा कि हमें सिखाते हुए डर लगता है तुम खुद सीख लो।
अब समझ नहीं आया कि क्या किया जाये? एक-दो दिन तो ऐसे ही ऊहापोह में गुजर गये। तीसरे दिन हमने और हमारे छोटे भाई ने हिम्मत करके कार की चाबी उठाई और घुस गये कार में। हालत ये थी कि न तो हमें कार चलानी आती थी और न ही हमारे छोटे भाई को।
इसके बाद भी हिम्मत करके चाबी लगाई, घुमाई और कार स्टार्ट। चूँकि हमारे घर के पास जगह कम होने के कारण कार सीधी तो आ जाती है पर जब उसे सड़क तक लाना हो तो बैक करके ही लाना होता है। कार चलाना सीखना भी था तो समझ नहीं आया कि अभी सीधे-सीधे तो चलानी आती नहीं है बैक कैसे करेंगे?
हम बैठे थे ड्राइविंग सीट पर और छोटा भाई बगल में। लगाया बैक गियर और कार धीरे-धीरे पीछे को जाने लगी। ऐसा अभी तक आराम से हो रहा था तो हिम्मत भी आ रही थी। जैसे-तैसे चार-पाँच बार कार के बन्द होने के बाद वह सड़क पर आ गई।
अब लगाया गियर एक और दबाया एक्सीलेटर पर गाड़ी रफ्तार ही न पकड़े। छोटा भाई कहें कि ब्रेक पर पैर न रखना, हमने देखा कि हम ब्रेक पर पैर भी नहीं रखे हैं पर गाड़ी अपनी रफ्तार में नहीं है।
लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये। कार को बन्द कर नीचे उतर आये। अबकी छोटा भाई ड्राइविंग सीट पर बैठा कार स्टार्ट और फिर वही स्थिति। कुछ समझ नहीं आया। तभी मोहल्ले के एक भाईसाहब निकले, हमने आवाज देकर उन्हें बुलाया और अपनी समस्या बताई। भाईसाहब ने एक पल की देरी किये बिना कहा कि देखो हैंडब्रेक तो नहीं लगा है?
अब पता तो था नहीं कि ये क्या बला होती है। भाईसाहब ने बताया और उस समस्या को दूर किया। अब कार अपनी असल रफ्तार पर थी। अब एक और समस्या, गियर लगायें तो उसी तरफ देखने लगें कि कौन सा लगा है और पता चले के कार सड़क के दूसरी ओर भागने लगे। फिर कार को सड़क के बीच में लायें और जब अगला गियर डालें तो फिर वही स्थिति। लगभग एक घंटे तक सड़क पर कार को हम दोनों भाई दौड़ाते रहे और सीख भी गये।
इस कार सीखने में अच्छाई यह रही कि हमने किसी को चोटिल नहीं किया। अगले दिन हम अपनी दादी, अम्मा, चाची को कार में बिठा कर पास के राध-कृष्ण मंदिर के दर्शन करवाने ले गये। भीड़ में कार चलाना सीखना और फिर परिवार के सदस्यों को घुमाने ने गजब का आत्मविश्वास ड्राइविंग को लेकर पैदा किया जो आज तक बना हुआ है।
चाचा की एक बात आज भी याद आती है जो उन्होंने हम लोगों के लौटने के बाद कही थी कि यदि तुममे कार चलाना सीखने की हिम्मत होगी तो बिना किसी सहारे के सीख लोगे, हम क्या कोई भी तुमको सिखा नहीं सकेगा। आज लगता है कि यह बात हर एक काम में लागू होती है।

5 टिप्पणियाँ:

आमीन ने कहा…

अच्छा लिखा है सर, बधाई

http://dunalee.blogspot.com/

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बढ़िया संस्मरण

Anil Pusadkar ने कहा…

भई वाह!मगर हमने तो अपने मित्र के सहारे ही सीखा था।

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

किस भी तकनीक को सीखने के लिए मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है लेकिन सीखना स्वयं पड़ता है

Mohdkhan Israil ने कहा…

thanks