आप सबसे इस ब्लाग पर रचनाओं के प्रकाशन के सम्बन्ध में मात्र इतना निवेदन करना है कि रचनायें ब्लाग की प्रकृति के अनुरूप हों तो ब्लाग की सार्थकता साबित होगी।
------------------------------------------------
ब्लाग पर कविता, कहानी, गजल आदि को प्रकाशित न करें।
जो साथी इसके सदस्य नहीं हैं वे प्रकाशन हेतु कविता, कहानी, गजल आदि रचनाओं को कृपया न भेजें, इन्हें इस ब्लाग पर प्रकाशित कर पाना सम्भव नहीं हो सकेगा।

कृपया सहयोग करें

सभी साथियों से अनुरोध है कि अपनी रचनायें ब्लाग की प्रकृति के अनुसार ही पोस्ट करें। ऐसा न हो पाने की स्थिति में प्रकाशित पोस्ट को निकाला भी जा सकता है।

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

पहला अहसास --ज्ञान व अन्य भाषा का ज्ञान भी अत्यावश्यक.----

हम एक सामान्य, सहज,स्वतः आने वाले ऋजु-मार्ग के अनुगामी परिवार थे , अधिक तेज दौड़ने में विशवास न रखकर स्वतः ही जो प्राप्त हो , सत्य, न्याय मार्ग से; उस के अनुगमन करने वाले पिता एक मध्यम आय व वर्ग के सम्माननीय नागरिक ; जो सोचते थे कि व्यक्ति को अच्छा व्यक्ति होना चाहिए ,धंधा तो कुछ भी किया जासकता है जीवन यापन के लिए , हम बच्चे, भाई -बहिन आदि अच्छी तरह ज्ञान लें, पास हों तो ठीक ,बहुत मारा-मारी ,अच्छे नम्बर आदि की चिंता नहीं। मेरे ख्याल में उस समय सभी के यही विचार थे। (सभी के एकसे कभी नहीं होते ), यद्यपि उस समय स्कूल छोड़ने पर दंड ,फाइन होता थापर फ़िर भी अधिकतर अबिभावक चिंता नहीं करते थे , सरकार शिक्षा को प्रोमोट कर रही थी। नेता , अफसर,व्यापारी ,सामान्य जन-ईमानदार था, हाँ आज़ादी के फल चखने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे सिर उठा रही थी। भारतीय ज्ञान, संस्कृति,आदि पर हमले सुनकर बुरा तो लगता था पर विरोध की कोई राह नहीं दिखती थी ।
में ५थ क्लास पास करके घर बैठ गया , कुछ भी कर लेंगे,परन्तु लगभग २ वर्ष बाद मेरे बड़े भाई (जो परिवार में अधिक जागरूक थे व १० क्लास में थे ), ने अचानक सोचा कि तुम ८ वीं की परिक्षा प्राइवेट दो , फ़ेल भी चलेगा । फेल होने पर मुझे एक स्कूल में ८थ में भर्ती किया गया।
मुझे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी, दूसरे ही दिन , स्कूल में क्लास का टाइम टेबल अंग्रेजी में था ; मैंने क्लास -मानीटर से पूछा , यह ,क्या लिखा है? उसका उत्तर था , तुम नहीं समझ पाओगे । बस वही क्षण था जब मैंने प्रथम बार अहसास किया कि मुझे,ज्ञान की , अंग्रेजी भाषा ज्ञान की कितनी आवश्यकता है , अंग्रेजी दां लोग, विदेशी रंग में रंगे लोगों को जवाब देने के लिए यह भाषा अवश्य सीखना चाहिए, विरोधी स्वरों के प्रत्युत्तर की यह भी एक राह है ,तथा आगे बढ़ने के लिए, शिक्षा प्राप्त करना कितना आवश्यक है ; और फ़िर आज तक मैंने मुड़ करपीछे नहीं देखा। संसार के साहित्य, संस्कृति, धर्म, विचार, दर्शन जानकर मुझे पुनः अनुभव व निश्चय हुआ कि --" पर भारत की बात निराली " , हर क्रिटिसिज्म व विरोधी विचार का उत्तर दिया जा सकता है।

3 टिप्पणियाँ:

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

बिलकुल सही कहा आपने। हमारे लिए भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है। इसको किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शरद कोकास ने कहा…

कई बार ,कोंचने से भी जीवन की दिशा बदल जाती है ।

Dr.Aditya Kumar ने कहा…

अक्सर कोई बात जब मन में चुभ जाती है ,एक नई सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करती है .