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गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

बांधवगढ की सैर और शेर के दर्शन....

दो साल पहले ,मई में अचानक ही राजा (डॉ.सुजीत शुक्ल ) का फोन आया, बांधवगढ़ चलना है. मैंने कहा की मई में तो मेरे "ग्रीष्मकालीन भ्रमण कार्यक्रम" तय हैं. रिज़र्वेशन भी हो चुके हैं. राजा बोला " चलो, जून में चलते हैं. लेकिन इसके आगे नहीं. अपने कार्यक्रम १० जून तक समेट लो, भैया से भी बोलो छुट्टियां तैयार रखें. कोई बहाना नहीं. "

अधिकार सहित दिए गए इस आदेश की अवहेलना संभव थी क्या? अपने डेढ़ महीने के कार्यक्रम को एक महीने में समेटा और १० जून को वापस आ गए, सतना. ११ जून को राजा ,और मेरी बुआ सास (राजा की मम्मी) मुंबई से सतना पहुँच गए. अगले दिन हमें बांधवगढ़ के लिए बड़े सबेरे निकलना था.

बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है.
बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है. हमारी गाडी पहाडियों पर सर्पिल रास्तों से होती हुई आगे बढ़ रही थी. इतना सुन्दर दृश्य!! वर्णनातीत ! इसी पर्वत श्रृंखला में है मोहनिया घटी, जहाँ पहली बार सफ़ेद शेर मिला, इसीलिए उसका नाम मोहन रखा गया.


सुबह १० बजे हम बांधव गढ़ पहुंचे. राजा ने पहले ही सत्येन्द्र जी के रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. हम सीधे वहीं पहुंचे.
ये रिसोर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहाँ से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता. लगता है कि हम बीच जंगल में हैं. अलग-अलग बने खूबसूरत कॉटेज घाना बगीचा, आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटके बड़े-बड़े असंख्य आम...अनारों से लादे वृक्ष...बहुत सुन्दर स्थान. मन खुश हो गया. देर तक सत्येन्द्र जी और के दोनों ही हमारे साथ गप्पें करते रहे. लंच के बाद सत्येन्द्र जी ही हमें नेशनल पार्क कि पहली साइटिंग पर ले गए. और जंगल के बारे में अमां जानकारियां दिन. अद्भुत ज्ञान है उन्हें जंगल और जंगली जीवों का. पहले दिन तो हम जंगल कि खूबसूरती ही देखते रह गए...हिरन और चीतल जैसे जानवर भी मिले. शेर के पंजों के निशान भी मिले...... इतने घने जंगल............क्या कहें...

दूसरे दिन सुबह चार बजे हम उठ गए और साढे चार बजे जंगल कि तरफ अपनी सफारी में निकल लिए. किस्मत अच्छी थी............दो राउंड के बाद ही शेर के दर्शन हो गए.
हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई
आराम फरमाता शेर......हम बांधवगढ में थे और अलस्सुबह ही हमें शेर के दर्शन हुए थे। उसकी गुर्राहट कानों में अभी भी गूंज रही थी। शाम की साइटिंग के बाद हमने कुछ शौपिन्ग की और रात दस बजे के आस-पास अपने रिसोर्ट पहुंचे। साढे दस बजे वेटर ने डिनर लगा दिये जाने की सूचना दी। हम सब डाइनिंग स्पेस की तरफ बढे। डाइनिंग स्पेस.... पर्यटकों को जंगल का अहसास दिलाने के लिये पूरा रिसोर्ट ही घने जंगल जैसा था , लेकिन ये स्पेस तो केवल आधी-आधी दीवारों से ही घिरा था. खैर... हम डिनर के लिये पहुंचे.अभी हम खाना प्लेटों में निकाल ही रहे थे, कि कुछ गहरी सी, गुर्राहट सी सुनाई दी. सब ने सुनी, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा.एक बार...दो बार...तीन बार.... अब बर्दाश्त से बाहर था.... आवाज़ एकदम पास आ गई थी। मेरी बेटी ने पहल की- बोली ये कैसी आवाज़ है? अब सब बोलने लगे- हां हमने भी सुनी... हमने भी.... खाना सर्व कर रहे वेटर ने बेतकल्लुफ़ी से कहा-अरे ये तो बिल्ली की आवाज़ है. अयं...ऐसी आवाज़ में बिल्ली कब से बोलने लगी!!!
नहीं.....ये बिल्ली नहीं है.....गुर्राहट और तेज़ हो गई.... अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम....जंगल से लगा हुआ रिसोर्ट...हदबंदी के लिये बाड तक नहीं.....हम सब तो थे ही, मेरी भांजी भी साथ में....हे ईश्वर!!! दौड के दोनों बच्चों को किचन में बंद किया. अब सारे वेटर भी डरे हुए....बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां...... पिछले दिनों एक लडके को खा गया था.... काटो तो खून नहीं.......टेबल पर जस का तस पडा खाना..... हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई. कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था. खैर....धीरे-धीरे उतरे.... एक-दूसरे का हाथ पकडे किसी प्रकार कौटेज़ तक पहुंचे. आह.... सुकून की लम्बी सांस...... पूरी रात आंखों में कटी. सबेरे जब हम फिर साइटिंग के लिये पहंचे- लोगों को कहते सुना- रात बोखा( मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़ आया था!!!!!!!!!!

रविवार, 3 अप्रैल 2011

बजा क्रिकेट में भारत का डंका ।

हार गयी वर्ल्ड कप में लंका ,
बजा क्रिकेट में भारत का डंका ।
मैच फायनल, था क्या हाल ?
अंतिम क्षण तक मन बेहाल ।
सबका रहा धड़कता दिल ,
जबतक जीत गयी नहीं मिल।
सबने अच्छी क्रिकेट खेली ,
सबकी अपनी-अपनी शैली ।
पलड़ा कभी, किसी का झुकता,
हर दर्शक का ह्रदय उछलता ।
जब हुए सहवाग,सचिन आउट ,
लगा जीत में अब है डाउट ।
गौतम निकले अति गंभीर,
भारत की अच्छी तक़दीर ।
था विराट का सुखद प्रयास ,
जिससे बधीं जीत की आस ।
फिर धोनी की सुन्दर पारी ,
जिससे बिखरीं खुशिया सारी ।
किया बालरों ने भी कमाल ,
फील्डिंग से रहे विरोधी बेहाल ।
वर्ष अठाईस का इंतजार ,
ख़त्म किया कैप्टन ने छक्का मार।
सर्वश्रेष्ठ अपना युवराज ,
हर भारतवासी को नाज ।
हुईं ख़ुशी से आँखें नम ,
आखिर जीते वर्ल्ड कप हम ।
रूप कोई भी हो क्रिकेट का ,
भारत अब है नंबर वन ।

सोमवार, 21 मार्च 2011

भांग की मस्ती और रेलवे स्टेशन का हुडदंग

भांग की मस्ती और रेलवे स्टेशन का हुडदंग
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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होली आये और होली में किये हुए हुड़दंग भी याद न आयें तो समझो कि होली मनाई ही नहीं। हम लोग संयुक्त परिवार में रहते आये हैं और अपने बचपन से ही सभी पारिवारिकजनों के साथ ही होली का मजा लूटते रहे हैं। होली जलने की रात से शुरू हुआ धमाल कई-कई दिनों तक चलता रहता था। बचपन में अपने बड़ों की मदद से होली का हुड़दंग किया जाता था लेकिन स्वतन्त्र रूप से होली का हुड़दंग मचा जब हम अपनी उच्च शिक्षा के लिए ग्वालियर गये।

हॉस्टल का माहौल एकदम पारिवारिकता से भरपूर था। हम सभी छात्रों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं था। पहला ही साल था और हम सभी मिलकर दीपावली, दशहरा आदि अपने-अपने घरों में मनाने के पहले हॉस्टल में एकसाथ मना लिया करते थे। इसी विचार के साथ कि होली भी घर जाने के पहले हॉस्टल में मना ली जायेगी सभी कुछ न कुछ प्लानिंग करने में लगे थे।

हम कुछ लोगों का एक ग्रुप इस तरह का था जो हॉस्टल की व्यवस्था में कुछ ज्यादा ही सक्रिय रहा करता था। इसी कारण से उन दिनों हॉस्टल की कैंटीन की जिम्मेवारी हम सदस्यों पर ही थी। होली की छुट्टियां होने के ठीक दो-तीन दिन पहले रविवार था। रविवार इस कारण से हम हॉस्टल वालों के लिए विशेष हुआ करता था कि उस दिन एक समय-दोपहर का- भोजन बना करता था, खाना बनाने वाले को रात के खाने का अवकाश दिया जाता था। रविवार को पूड़ी, सब्जी, खीर, रायता आदि बना करता था। हम सदस्यों ने सोचा कि कुछ अलग तरह से इस दिन का मजा लिया जाये।

हमारी इस सोच में और तड़का इससे और लग गया जब पता चला कि हॉस्टल के बहुत से छात्र उसी रविवार को अपने-अपने घर जा रहे हैं। रविवार के भोजन को खास बनाने की योजना हम दोस्तों तक रही और अन्य सभी छात्रों के साथ आम सहमति बनी कि होली इसी रविवार को खेली जायेगी, उसके बाद ही जिसको घर जाना है वो जायेगा।

हम दोस्तों ने अपनी योजना के मुताबिक उस दिन खाने में खीर में खूब सारी भांग मिलवा दी। इस बात की चर्चा किसी से भी नहीं की। सभी ने मिलकर खाना खाया और हम दोस्तों ने सभी को खूब छक कर खीर खिलवाई। मीठे के साथ भांग का नशा और उस पर होली की हुड़दंग का सुरूर....हॉस्टल के सभी छात्रों पर तो जैसे मस्ती खुद आकर विराज गई हो। खूब दम से होली खेली जाने लगी, टेप चलाकर गानों के साथ नाच भी शुरू हुआ। किसी के बीच सीनियर-जूनियर जैसी बात नहीं दिख रही थी।

इसी बीच कुछ छात्र जो होली नहीं खेलना चाहते थे और उन्हें घर भी जाना था, सो उन्होंने खीर भी इतनी नहीं खाई थी कि नशा उनको अपने वश में करता। ऐसे लगभग पांच-छह छात्रों ने हॉस्टल की दीवार फांदकर रेलवे स्टेशन की ओर भागना शुरू किया। उनके दीवार फांदने का कारण ये था कि हम सभी रंगों से भरी बाल्टी आदि लेकर दरवाजे पर ही बैठे थे कि कोई भी बिना रंगे घर न जा पाये। इस बीच उनका भागना हुआ और हम लोगों को भनक लग गई कि कुछ लोग जो हमारी इस होली में साथ नहीं हैं वे पीछे से भाग गये। बस फिर क्या था, होली का हुड़दंग सिर पर चढ़ा हुआ था, भांग का नशा अपनी मस्ती दिखा ही रहा था, हम सभी जो जिस तरह से बैठा था वैसे ही रेलवे स्टेशन की तरफ दौड़ पड़ा।

कोई नंगे पैर तो कोई एक पैर में चप्पल-एक पैर में जूता बिधाये; कोई शर्ट तो पहने है पर पैंट गायब तो कोई नंगे बदन दौड़े ही जा रहा था। और तो और क्योंकि उन्हें रंगना भी था जो बिना रंगे निकल पड़े थे तो हाथों में रंगों से भरी बाल्टी भी लिये सड़क पर दौड़ चल रही थी। आप सोचिए कि बिना होली आये, होली जैसी मस्ती को धारण किये एकसाथ लगभग 20-25 लड़के बिना किसी की परवाह किये बस सड़क पर दौड़े चले जा रहे थे। लगभग चार-पांच किमी की दौड़ लगाने के बाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हुरियारों की टोली पहुंच ही गई, वे भी बरामद हो गये जिनको रंगना था। बस फिर क्या था चालू हो गई होली रेलवे स्टेशन पर ही।

मस्ती का मूड, भांग का सुरूर, अपने साथियों को रंगने के बाद अपनी तरह के ही कुछ मस्ती के दीवाने यात्रियों को रंगना शुरू किया। कुछ देर का हुल्लड़ देखने के बाद प्लेटफॉर्म पर बनी चौकी के सिपाहियों ने आकर दिखाये दो-दो हाथ तो रंगीन हाथ उनके साथ भी हो गये पर बाद में डर के मारे सभी वापस हॉस्टल लौट पड़े। हद तो तब हो गई जबकि भांग का नशा तो दूसरे दिन दोपहर तक उतर गया किन्तु सिर का भारीपन दो दिनों तक रहा। इसी भारीपन में नीबू चूस-चूस कर अपनी प्रयोगात्मक परीक्षा दी, जो सोमवार को सुबह सम्पन्न हुई। चूंकि हमारी रेल्वे स्टेशन की होली की खबर हमारे हॉस्टल वार्डन के पास तक आ चुकी थी तो सभी प्रोफेसर्स को पता था कि हम लोग किस मस्ती के साथ प्रयोगात्मक परीक्षा दे रहे हैं। यह तो भला हो उन सभी गुरुजनों का जिन्होंने पूरे सहयोग के साथ हमारी होली के आनन्द और प्रयोगात्मक परीक्षा के बीच संतुलन बिठा दिया।

आज भी कभी-कभी होली में भांग का स्वाद लेने का प्रयास किया जाता है तो हॉस्टल की होली और रेलवे स्टेशन का हुड़दंग याद आये बिना नहीं रहता है।

रविवार, 2 जनवरी 2011

ओ री चवन्नी तू याद बहुत आएगी!!!

अभी हाल में एक समाचार पढ़ा कि अब पच्चीस पैसे (चवन्नी) का सिक्का चलन में नहीं रहेगा। सरकार की ओर से स्टील की मंहगाई और अन्य दूसरे कारणों के कारण पच्चीस पैसे को बनाना बन्द करके इसका चलन भी बन्द कर दिया गया है। वैसे देखा जाये तो सरकारी आदेश के पहले भी पच्चीस पैसे का चलन जनता ने स्वयं ही बन्द कर दिया था। लोगों का कहना था कि अब पच्चीस पैसे (चवन्नी) का सिक्का भिखारी भी नहीं लेता है। भले ही कुछ लोगों ने इसको सिर्फ सुना हो पर हमने तो वास्तविकता में इसे देखा और सहा है।

चित्र गूगल छवियों से साभार
यह बात किसी और दिन, अभी तो वह बात जो इस सिक्के के बन्द हो जाने पर याद आ गई।

बात उन दिनों की है जब हम कक्षा सात-आठ में पढ़ा करते थे। राजकीय इंटर कालेज, उरई के छात्र थे और हमको स्कूल जाने पर नित्य जेबखर्च के रूप में पच्चीस पैसे ही मिला करते थे। हो सकता है कि आज के बच्चों को यह बहुत ही आश्चर्य भरा लगे कि रोज का जेबखर्च मात्र चवन्नी पर उस समय यह किसी करोड़पति के खजाने से कम नहीं होता था हमारे लिए।

ये बातें सन् 85-86 की हैं। उस समय इस एक छोटे से सिक्के के साथ एक छोटी सी पार्टी भी हो जाया करती थी। हम दो-तीन दोस्त एकसाथ हमेशा रहा करते थे और मिलमिला कर सभी के सिक्के एक ग्रांड पार्टी का आधार तैयार कर दिया करते थे।

विशेष बात तो यह होती थी घर से स्कूल जाते समय अम्मा ही चवन्नी दिया करती थीं। कभी-कभार ऐसा होता था कि थोड़ी बहुत देर होने के कारण अथवा किसी और भी वजह से हमें छोड़ने के लिए पिताजी साइकिल से जाया करते थे। उनकी हमेशा से एक आदत रही थी कि स्कूल के गेट पर हमें साइकिल से उतारने के बाद हमसे पूछा करते थे कि पैसे मिले? झूठ बोलने की हिम्मत तो जुटा ही नहीं पाते तो या तो चुप रह जाते या फिर कह देते कि हां हैं। इसके बाद पिताजी अपनी जेब से पच्चीस पैसे का उपहार हमें दे ही देते।

चूंकि पिताजी कभी-कभी ही छोड़ने आते थे और जिस दिन उनका आना होता उस दिन हमारा जेबखर्च पच्चीस से बढ़कर पचास हो जाया करता था। समझिए कि उस दिन तो बस चांदी ही चांदी होती थी। क्या कुछ ले लिया जाये और क्या कुछ छोड़ा जाये, समझ में ही नहीं आता था। उस समय स्कूल परिसर में कोई भी ऐसी सामग्री बेचने भी नहीं दी जाती थी जो हानिकारक हो, इस कारण से घरवाले भी निश्चिन्त रहते थे।

पच्चीस पैसे की नवाबी उस समय और तेजी से बढ़ गई जब हमारे साथ पढ़ने के लिए हमारा छोटा भाई भी साथ जाने लगा। अब हम दो जनों के बीच पचास पैसे की जमींदारी हो गई जो हमारी मित्र मंडली में किसी के पास नहीं होती थी। हम दो भाइयों के बीच एकसाथ रूप से आये पचास पैसे के मालिकाना हक से हम अपनी मित्र मंडली पर रोब भी जमा लेते थे पर भोजनावकाश में सारी हेकड़ी आपस में खान-पान को लेकर छूमंतर हो जाती थी। सबके सब अपने अपने छोटे से करोडपतित्व को आपस में मिला कर हर सामग्री का मजा उठा लेते थे।

आज जब समाचार देखा तो बरबस ही उस चवन्नी की याद तो आई ही साथ में उन दस पैसे के पांच पैसे के सिक्कों की भी याद आ गई जो न जाने कब असमय ही चलन से बाहर हो गये। आह री चवन्नी! तुम्हारी याद तो हमेशा मन में रहेगी जिसने उस छोटी सी उम्र में ही नवाबी का एहसास करा दिया था, धन की अहमियत को समझा दिया था।

चित्र गूगल छवियों से साभार

आज चवन्नी के साथ यह भी याद आ गए।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

भाई-बहिन के पवित्र प्रेम का पर्व -- रक्षाबंधन








चित्र गूगल छवियों से साभार

शनिवार, 12 जून 2010

भीख लेने से पहले सवाल दागा - कौन जात के हो?

आजकल जनगणना चल रही है और इसमें जातिगत गणना को लेकर विवाद भी रहा, शोर-शराबा भी हुआ। इधर देखने में आया है कि समाज में जातिगत-विभेद को लेकर काफी कुछ लिखा-सुना जाता रहा है। हमारा मानना है कि इस समय के व्यावसायिकता भरे दौर में जातिगत भेद की जगह पर अमीर-गरीब का भेद ज्यादा दृष्टिगोचर हो रहा है। बहरहाल इस मुद्दे पर अपने ब्लॉग पर........यहाँ एक एहसास जो जाति को लेकर हमें आज से लगभग 12 साल पहले हुआ था।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

हमें अपने एक मित्र के साथ किसी काम से इलाहाबाद-बनारस आदि की यात्रा पर जाना पड़ा। शायद सन् 1999 की बात होगी, गर्मियों के दिन थे, शायद जून का महीना था। सफर के दौरान यदि ज्यादा समय यात्रा में लगना होता है तो घर से अम्मा भोजन साथ में बाँध दिया करती हैं। आज भी उनकी यही आदत है और इस आदत को हमने भी अपनी आदत बना लिया है। बाहर का कुछ खाने से बेहतर है कि घर का ही कुछ खाया जाये, इसी सोच से हम आज भी घर से कुछ न कुछ खाद्य सामग्री लेकर अपने साथ चलते हैं।

उस दिन उरई से ट्रेन सुबह लगभग 9 बजे के आसपास थी। हम और हमारा दोस्त हल्का-फुल्का सा पेट में डालकर स्टेशन पहुँचे और अपने समय पर ट्रेन के आने पर अपनी मंजिल को चल पड़े। रास्ते में दोपहर में भोजन का समय होने पर हमने घर से अपने साथ लेकर चले पूड़ी-सब्जी आदि का स्वाद लिया और अपनी भूख मिटाई। चूँकि अम्मा का लाड़-दुलार और उनकी निगाह में घर से बहुत दूर जाने की बात, सो पूड़ियाँ और सब्जी कुछ ज्यादा सी साथ में की दी गई।

हम दोनों लोगों ने अपने पेट और भूख के हिसाब से जितना भोजन पर्याप्त हो सकता था उतना किया और शेष को बापस डब्बे में रख दिया। सफर के दौरान हमारी एक आदत हमेशा रही है कि खाने का सामान थोड़ा-बहुत बचा ही लेते हैं और किसी भीख माँगने वाले बच्चे, वृद्ध को अथवा ट्रेन-बस में सफाई करने वाले बच्चे को दे देते हैं। भोजन कुछ ज्यादा होने के कारण और कुछ अपनी आदत के अनुसार बचा गया अथवा बचा लिया। चूँकि दिन गर्मियों के थे इस कारण सब्जी के खराब होने के डर से उसे नहीं बचाया।

उरई से चलकर हम इलाहाबाद तक आ गये और इसे इत्तेफाक कहिए कि पूरे सफर के दौरान कोई माँगने वाला अथवा सफाई करने वाला नहीं आया। दिमाग में डब्बे में रखी पूड़ियाँ और आम का आचार घूम रहा था। माहौल भी ऐसा है कि किसी को अपने आप कुछ भी खिलाने-देने का संकट मोल भी नहीं ले सकते थे।

हमारा दोस्त भी हमारी तरह की प्रवृत्ति का है सो वह भी भोजन के सही उपयोग का स्थान खोज रहा था। इलाहाबाद स्टेशन पर उतरे तो सोचा कि कोई व्यक्ति तो मिला नहीं जानवर ही मिल जाये तो उसको ही खिलाकर पूड़ियों को सही ठिकाने लगा दिया जाये। ट्रेन से उतरकर अभी मुश्किल से 20-25 कदम चले होंगे कि एक बुढ़िया वहीं प्लेटफॉर्म पर भीख माँगते दिखी। हम दोनों मित्रों ने एक दूसरे को देखा और लगा कि चलो अब किसी का भला हो जायेगा। हम दोनों उस बुढ़िया के पास पहुँचे और उससे पूछा कि अम्मा कुछ पूड़ियाँ और आम का अचार बचा है खाओगी?

उसके हाँ कहते ही हमने अपने बैग से डिब्बा निकाला और उस बुढ़िया को देने के लिए आगे बढ़ाया। उसने डिब्बा लेने के लिए अपना हाथ तो बढ़ाया नहीं वरन् एक सवाल उछाल दिया, जिसे सुनकर हम दोनों मित्रों के पैरों के नीचे से जमीन सरकने का एहसास हुआ। उस बुढ़िया ने डिब्बे को लेने का कोई जतन सा भी किये बगैर पहले पूछा कि बेटा कौन जात के हो?

गुस्सा तो बहुत आई किन्तु उस बुढ़िया से क्या कहते। इसी गुस्से में उस बुढ़िया से यह कहकर कि अम्मा तुम फिर न लेओ हमाईं पूड़ियाँ, काये से के हम दोउ जने अछूत हैं, आगे बढ़ गये।

लगा कि देश में जातिगत विभेद की भावना किस कदर घर किये है कि एक भीख माँगने वाली बुढ़िया भी जाति पूछ कर भोजन लेती है। स्टेशन से बाहर आकर उन पूड़ियों को एक गाय और एक कुत्ते के बीच बाँट दिया जो बिना जाति पूछे अपनी भूख मिटाने लगे।

मंगलवार, 25 मई 2010

केले के छिलके खाने को बेबस नौनिहाल देश के

इंसान की जिन्दगी में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होतीं हैं जब वह एकदम असहाय दशा में होता है और इस तरह की स्थितियों से बाहर आने के लिए वह कुछ भी कर बैठता है। ऐसी ही विषम स्थिति किसी भी व्यक्ति के जीवन में भूख के कारण आती है। कहा भी जाता है कि पेट जो न कराये वह कम है।

भूख में आदमी को दम तोड़ते भी सुना है, किसी भी स्थिति तक गिरते देखा है, चोरी करते सुना है, अपना जिस्म बेचते भी सुना है। भूख और गरीबी की विकट स्थिति से लड़ने-जूझने की, जिन्दा रहने की मारामारी में कुछ भी कर गुजरने के लिए उठाये गये कदमों में प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी के बारे में पढ़ रखा है कि वे किसी न किसी बहाने से पुलिस की पकड़ में आने की कोशिश करते थे। इससे उनके खाने और रहने की समस्या कुछ हद तक निपट जाया करती थी।

यह एक दशा है जो हमने पढ़ रखी है। कुछ इसी तरह की दशा से हमें रूबरू होने का कुअवसर उस समय मिला जब हम अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए सन् 1990 में ग्वालियर गये। हमारा रहना हॉस्टल में होता था और ग्वालियर में ही हमारे एक चाचाजी के रहने के कारण सप्ताह में एक बार उनके घर भी हो आते थे।

उरई जैसे छोटे से शहर से निकल कर ग्वालियर जैसे शहर में आने पर घूमने का अपना अलग ही मजा आता था। इसी कारण से चाचा के घर पर हमेशा रास्ते बदल-बदल कर जाया करते थे। एक दिन अपनी यात्रा के दौरान हमने रेलवे स्टेशन की ओर से जाने का फैसला किया। रेलवे स्टेशन के पास के ओवरब्रिज से चढ़ते हुए रेलवे स्टेशन का नजारा और सामने खड़े किले का दृश्य बहुत ही मजेदार लगता था। यह दृश्य अब ओझल हो चुका है क्योंकि अब दोनों ओर बड़ी-बड़ी इमारतों ने अपना स्थान जमा लिया है।

उस दिन जैसे ही ओवरब्रिज पर चढ़ने के लिए अपनी साइकिल को मोड़ा तो उसी मोड़ पर लगे कूड़े के ढ़ेर में एक बारह-तेरह साल का लड़का बैठा दिखा। ऐसे दृश्य अमूमन हमेशा ही किसी न किसी कूड़े के ढ़ेर पर दिखाई देते थे कि छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ कुछ न कुछ बीनते नजर आते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही लगा किन्तु ऐसा नहीं था। वह लड़का बजाय कूड़ा-करकट बीनने के कुछ और ही करता नजर आया।

एक पल को झटका सा लगा, वह लड़का कूड़े के ढेर में पड़े केले के छिलकों को खा रहा था। दिमाग को झटका दिया और अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाने के लिए पैडल पर जोर लगाया। मुश्किल से तीन या चार कदम ही साइकिल चल पाई होगी कि मन में उथल-पुथल मचने लगी। ब्रेक लगाये और वहीं खड़े हो गये अब न तो समझ में आये कि आगे बढ़ें या फिर इस लड़के के लिए कुछ करें।

अगले ही पल एक विचार किया और साइकिल को घुमा कर उस लड़के के पास खड़ा कर दिया। क्यों क्या कर रहे हो? की आवाज सुनकर उस लड़के के हाथ से केले का छिलका छूट गया, उसको लगा कि कहीं यह भी अपराध न कर रहा हो। उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकली, बस वह चुपचाप खड़ा हो गया।

हमने उससे खाना खाने के लिए पूछा तो उसने सिर हाँ की स्थिति में हिला दिया। उसको अपने साथ लेकर स्टेशन की बाहर ही तरफ बने होटलों की ओर ले गया। अब समस्या यह आनी थी कि उसको होटल में बिठाकर तो खिलाने को कोई भी तैयार नहीं होता। एक होटल में सोलह रुपये में एक थाली भोजन की मिलती थी। उससे एक थाली देने को कहा तो उसने बाहर देने से मनाकर दिया। इधर-उधर निगाह दौड़ा कर कुछ समाचार-पत्र और कुछ पॉलीथीन इकट्ठा किये और उस भूखे बच्चे के लिए भोजन प्राप्त किया।

तब से लेकर आज तक बहुत सी अच्छी बुरी घटनाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देखा-सुना है किन्तु आज भी वह घटना दिमाग से निकाले नहीं निकलती है। तब से लेकर आज तक एक नियम सा बना लिया है कि कभी भी माँगने वालों को, स्टेशन पर, ट्रेन में भीख माँगने वाले को, कूड़ा बीनने वाले बच्चों को कुछ रुपये देने की बजाय उनको खाना खिला देते हैं।