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आज पहली बार वोट देने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ, ऐसा नहीं है कि इसी साल हम १८ के हुए हैं, बिलकुल ऐसा नहीं है लेकिन कुछ ऐसा रहा कि अभी तक हमें वोट देने का मौका नहीं मिला..........19th फरवरी का इंतज़ार था...बस!!........18th से ही ये सोच में थे कि कौन से रंग का ड्रेस पहन कर वोट देने जाएँ... आखिर हमारे लिए तो एक उत्सव सरीखा तो था ही.
मेरी एक फ्रेंड ने मुझे सुझाया और हमने भी उसकी बात मान ली. सुबह-सुबह जल्दी से उठे और जल्दी से तैयार हो गए....लेकिन पापा ने कहा, अरे अभी नहीं १२-१२:३० बजे चलना.... फिर कैसे टाइम पास करें.......अच्छा चलो पेपर पढ़ लेते हैं...पेपर पढ़ा, एक कप काफी पी तब तक १२ बजा किसी तरह........!!
मै, पापा, माँ तीनो लोग साथ निकले....हम कार से नहीं गए क्योकि हमारे घर के करीब में ही जाना था सो हम व्हील चेयर से ही थे....
वहां पहुंचे तो, क्योकि ये पहली बार था तो हम थोडा असहज महसूस कर रहे थे...फिर भी खुश बहुत थे....वहां व्हील चेयर वालों के लिए कोई व्यवस्था न देख कर थोडा दुःख हुआ क्योकि मुझे यकीन था कि हमारे जैसे लोगो के बारे में सोचा गया होगा....लेकिन ऐसा कुछ नहीं था यहाँ तक कि कोई गार्ड भी मदद के लिए नही था........एक सज्जन ने ये कहा भी कि बताइए ऐसे लोगों के लिए ट्रैक होना चाहिए, ऐसा नहीं कि बजट नहीं आता लेकिन सब चोरी.......खैर! हमलोग मुस्कुराये और चल दिए आगे.....
वहां ४ सीढियाँ चढ़नी थी तो एक भैया वो भी वोट देने आये थे उन्होंने पापा की मदद की. हम उस रूम में पहुंचे……….मेरा कार्ड देखा गया फिर मुझसे दस्तखत करवाए गए, उसके बाद मेरी उंगली पर स्याही से निशान किया गया, जिसका मुझे बहुत इंतज़ार था.....हा हा हा. इसके बाद एक पर्ची देनी थी. एक कोई महाशय वहां बैठे थे, उनको पर्ची देने गई तो वो मुझे ही देखते रह गए. मेरे पीछे कई लोग थे जब उनलोगों ने आवाज़ लगाई तो उनका ध्यान मेरे उपर से हटा.
इसके बाद हम उस मशीन के पास पहुँच ही गए जहाँ मुझे अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का अवसर प्राप्त हुआ......बड़े ही ध्यानपूर्वक हमने अपना फ़र्ज़ अदा किया और मस्ती से चल दिए..........घर आते वक़्त जो भी जान-पहचान का मिलता उससे हम अपने वोट देने का सबूत दिखाते हुए घर पहुँच गए..........
ये मेरे ज़िन्दगी का पहला एहसास था वोटिंग का.............जिसे हम अपने दिल-ओ-दिमाग में सहेज कर रखेंगे....!
एक खास बात और आज की जो डेट थी वो मेरी बर्थडे डेट भी है, केवल डेट........हा हा हा..!! ये भी एक सुखद इत्तेफाक है..याद रखने के लिए!!!
अभी हाल में एक समाचार पढ़ा कि अब पच्चीस पैसे (चवन्नी) का सिक्का चलन में नहीं रहेगा। सरकार की ओर से स्टील की मंहगाई और अन्य दूसरे कारणों के कारण पच्चीस पैसे को बनाना बन्द करके इसका चलन भी बन्द कर दिया गया है। वैसे देखा जाये तो
सरकारी आदेश के पहले भी पच्चीस पैसे का चलन जनता ने स्वयं ही बन्द कर दिया था।
लोगों का कहना था कि अब पच्चीस पैसे (चवन्नी) का सिक्का भिखारी भी नहीं लेता है। भले ही कुछ लोगों ने इसको सिर्फ सुना हो पर हमने तो वास्तविकता में इसे देखा और सहा है।
चित्र गूगल छवियों से साभार यह बात किसी और दिन, अभी तो वह बात जो इस सिक्के के बन्द हो जाने पर याद आ गई। बात उन दिनों की है जब हम कक्षा सात-आठ में पढ़ा करते थे। राजकीय इंटर कालेज, उरई के छात्र थे और हमको स्कूल जाने पर नित्य जेबखर्च के रूप में पच्चीस पैसे ही मिला करते थे। हो सकता है कि आज के बच्चों को यह बहुत ही आश्चर्य भरा लगे कि रोज का जेबखर्च मात्र चवन्नी पर
उस समय यह किसी करोड़पति के खजाने से कम नहीं होता था हमारे लिए। ये बातें सन् 85-86 की हैं। उस समय इस एक छोटे से सिक्के के साथ एक छोटी सी पार्टी भी हो जाया करती थी। हम दो-तीन दोस्त एकसाथ हमेशा रहा करते थे और मिलमिला कर सभी के सिक्के एक ग्रांड पार्टी का आधार तैयार कर दिया करते थे।
विशेष बात तो यह होती थी घर से स्कूल जाते समय अम्मा ही चवन्नी दिया करती थीं। कभी-कभार ऐसा होता था कि थोड़ी बहुत देर होने के कारण अथवा किसी और भी वजह से हमें छोड़ने के लिए पिताजी साइकिल से जाया करते थे। उनकी हमेशा से एक आदत रही थी कि स्कूल के गेट पर हमें साइकिल से उतारने के बाद हमसे पूछा करते थे कि पैसे मिले? झूठ बोलने की हिम्मत तो जुटा ही नहीं पाते तो या तो चुप रह जाते या फिर कह देते कि हां हैं। इसके बाद पिताजी अपनी जेब से पच्चीस पैसे का उपहार हमें दे ही देते।
चूंकि पिताजी कभी-कभी ही छोड़ने आते थे और जिस दिन उनका आना होता उस दिन हमारा जेबखर्च पच्चीस से बढ़कर पचास हो जाया करता था। समझिए कि उस दिन तो बस चांदी ही चांदी होती थी। क्या कुछ ले लिया जाये और क्या कुछ छोड़ा जाये, समझ में ही नहीं आता था। उस समय स्कूल परिसर में कोई भी ऐसी सामग्री बेचने भी नहीं दी जाती थी जो हानिकारक हो, इस कारण से घरवाले भी निश्चिन्त रहते थे।
पच्चीस पैसे की नवाबी उस समय और तेजी से बढ़ गई जब हमारे साथ पढ़ने के लिए हमारा छोटा भाई भी साथ जाने लगा। अब हम दो जनों के बीच पचास पैसे की जमींदारी हो गई जो हमारी मित्र मंडली में किसी के पास नहीं होती थी। हम दो भाइयों के बीच एकसाथ रूप से आये पचास पैसे के मालिकाना हक से हम अपनी मित्र मंडली पर रोब भी जमा लेते थे पर भोजनावकाश में सारी हेकड़ी आपस में खान-पान को लेकर छूमंतर हो जाती थी।
सबके सब अपने अपने छोटे से करोडपतित्व को आपस में मिला कर हर सामग्री का मजा उठा लेते थे।आज जब समाचार देखा तो बरबस ही उस चवन्नी की याद तो आई ही साथ में उन दस पैसे के पांच पैसे के सिक्कों की भी याद आ गई जो न जाने कब असमय ही चलन से बाहर हो गये। आह री चवन्नी! तुम्हारी याद तो हमेशा मन में रहेगी जिसने उस छोटी सी उम्र में ही नवाबी का एहसास करा दिया था, धन की अहमियत को समझा दिया था।
चित्र गूगल छवियों से साभार
आज चवन्नी के साथ यह भी याद आ गए।
दिसम्बर २००६ को मैंने अपने ब्लॉग को ब्लॉगर पर रजिस्टर कराया था . उस समय पता नहीं था कि हिंदी में भी ब्लॉग्गिंग प्रारंभ हो गयी है. नाम जरूर हिंदी में रखा था "संस्कृति " उस पल में न जाने कौनसा विचार था जिसने इस नाम को सामने किया . आज देखें तो हम इसी पर विचार कर रहे हैं . कुछ इसे कविता के रूप में कोई कहानी के रूप में . सभी अपना योगदान कर रहे हैं छोटे बड़े रूप में अपनी अपनी तरह से .
मेरी मुलाकात हुई एक कांफेरंस के सिलसिले में अनिल पुसदकर से हुई कई बार चर्चाएं हुईं . डॉ अजय सक्सेना जो माध्यम हुए इस मुलाकात के, ने मुझे सुझाव दिया अपना ब्लॉग लिखने के लिए . ध्यान आया मैंने एक ब्लॉग तो रजिस्टर किया था . जाकर देखा तो वह अपनी जगह था शायद मेरी राह देखते हुए :) फिर तो जो सिलसिला शुरु हुआ जारी है. अनिल ने मुझे अपने ब्लॉग के जरिये सामने रखा ब्लॉगजगत के
http://anilpusadkar.blogspot.com/2009/04/blog-post_05.html नए दूर और पास के लोगों से जानकारी मिलने और सम्पर्क करने का . कुछ मौके ऐसे भी आ गए जिनमे तल्खी का सामना करना पड़ा लेकिन जीवन है और उसके सतरंग. कल मुझे आमंत्रण मिला पहला अहसास से जुड़ने का, धन्यवाद इस नयी शुरुआत से जुड़ने का .