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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

जब पहली बार स्कूटर चलाया

कालेज में पढाई के दिनों एक रविवारीय अवकाश के दिन मै दोपहर में श्री कल्याण राजपूत छात्रावास ,सीकर के अपने कमरे में विश्राम कर रहा था कि मेरे दो दोस्त रामपाल जी गाडोदिया और रविन्द्र जी जाजू प्रिया स्कूटर लेकर आये और कहने लगे कि चलो औधोगिक क्षेत्र की सूनी पड़ी सड़क पर स्कूटर चलाना सीखते है वे दोनों दोस्त समझते थे कि मुझे स्कूटर चलाने का अनुभव है ताकि सिखने में मै उनकी पूरी मदद करूँगा | हालाँकि उस दिन तक मुझे भी स्कूटर चलाना नहीं आता था लेकिन बस यूँ ही फेंक रखी थी कि मै तो ड्राइविंग में एक्सपर्ट हूँ | खैर में भी स्कूटर पर उन दोनों के पीछे बैठ गया स्कूटर रामपाल जी चला रहे थे उन्होंने भी उस दिन पहली बार स्कूटर पर हाथ मारा था | उस दिन रामपाल जी के बड़े भाई ओम जी जिनका स्कूटर था बाहर गए हुए थे इसलिए पीछे से स्कूटर उडाने का अच्छा मौका हाथ लगा था |
उस दिन सबसे मजे की बात तो यह रही कि रामपाल जी पहली बार स्कूटर चलाकर ५ कि.मी. भीड़ भाड़ वाले इलाके से निकल मेरे होस्टल पहुँच गए और फिर भी औधोगिक क्षेत्र की सूनी सड़क पर जाकर चलाना सीखना चाहते थे |
रास्ते में एक मौड़ पर स्कूटर गिरने के बाद आखिर हम तीनो औधोगिक क्षेत्र की सूनी पड़ी सड़क पर पहुँच गए और वहां बारी बारी से एक एक कर स्कूटर चलाने लगे | जब पहली बार स्कूटर में गियर डाल जैसे ही कल्च छोडा स्कूटर झटका खाकर बंद हो गया जिसे मैंने यह कह कर टाल दिया कि ये स्कूटर पहली बार हाथ में आया है ना इसलिए बंद हो गया | लेकिन दूसरी बार बिना किसी दिक्कत के हम स्कूटर चलाने में कामयाब रहे और तो और उसी समय पांच सात किलोमीटर चलाने के बाद साइकिल की तर्ज पर स्कूटर भी थोडा हाथ छोड़कर चलाने की कोशिश की | उसमे भी कामयाबी मिल ही गयी और हम अपने दोनों दोस्तों को यह यकीन दिलाने में कामयाब रहे कि हमें तो स्कूटर चलाना पहले से ही आता था लेकिन उस एक आध घंटे में बिना घुटने तुडवाये जो स्कूटर चलाने पर अपने मन में अपने आप पर जो गर्व का अहसास हो रहा था उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता |

चित्र कालेज में पढ़ते समय का है जिसमे क्रमश: बाए से रविन्द्र जी जाजू ,मै व रामपाल जी है

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

पहला अहसास --ज्ञान व अन्य भाषा का ज्ञान भी अत्यावश्यक.----

हम एक सामान्य, सहज,स्वतः आने वाले ऋजु-मार्ग के अनुगामी परिवार थे , अधिक तेज दौड़ने में विशवास न रखकर स्वतः ही जो प्राप्त हो , सत्य, न्याय मार्ग से; उस के अनुगमन करने वाले पिता एक मध्यम आय व वर्ग के सम्माननीय नागरिक ; जो सोचते थे कि व्यक्ति को अच्छा व्यक्ति होना चाहिए ,धंधा तो कुछ भी किया जासकता है जीवन यापन के लिए , हम बच्चे, भाई -बहिन आदि अच्छी तरह ज्ञान लें, पास हों तो ठीक ,बहुत मारा-मारी ,अच्छे नम्बर आदि की चिंता नहीं। मेरे ख्याल में उस समय सभी के यही विचार थे। (सभी के एकसे कभी नहीं होते ), यद्यपि उस समय स्कूल छोड़ने पर दंड ,फाइन होता थापर फ़िर भी अधिकतर अबिभावक चिंता नहीं करते थे , सरकार शिक्षा को प्रोमोट कर रही थी। नेता , अफसर,व्यापारी ,सामान्य जन-ईमानदार था, हाँ आज़ादी के फल चखने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे सिर उठा रही थी। भारतीय ज्ञान, संस्कृति,आदि पर हमले सुनकर बुरा तो लगता था पर विरोध की कोई राह नहीं दिखती थी ।
में ५थ क्लास पास करके घर बैठ गया , कुछ भी कर लेंगे,परन्तु लगभग २ वर्ष बाद मेरे बड़े भाई (जो परिवार में अधिक जागरूक थे व १० क्लास में थे ), ने अचानक सोचा कि तुम ८ वीं की परिक्षा प्राइवेट दो , फ़ेल भी चलेगा । फेल होने पर मुझे एक स्कूल में ८थ में भर्ती किया गया।
मुझे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी, दूसरे ही दिन , स्कूल में क्लास का टाइम टेबल अंग्रेजी में था ; मैंने क्लास -मानीटर से पूछा , यह ,क्या लिखा है? उसका उत्तर था , तुम नहीं समझ पाओगे । बस वही क्षण था जब मैंने प्रथम बार अहसास किया कि मुझे,ज्ञान की , अंग्रेजी भाषा ज्ञान की कितनी आवश्यकता है , अंग्रेजी दां लोग, विदेशी रंग में रंगे लोगों को जवाब देने के लिए यह भाषा अवश्य सीखना चाहिए, विरोधी स्वरों के प्रत्युत्तर की यह भी एक राह है ,तथा आगे बढ़ने के लिए, शिक्षा प्राप्त करना कितना आवश्यक है ; और फ़िर आज तक मैंने मुड़ करपीछे नहीं देखा। संसार के साहित्य, संस्कृति, धर्म, विचार, दर्शन जानकर मुझे पुनः अनुभव व निश्चय हुआ कि --" पर भारत की बात निराली " , हर क्रिटिसिज्म व विरोधी विचार का उत्तर दिया जा सकता है।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

पब्लिक फोन से मिलाते रहे एस0टी0डी0

आज के बच्चे पैदा होते ही फोन, मोबाइल का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। हमें अच्छी तरह याद है कि उस समय हम कक्षा आठ में पढ़ा करते थे। हमारे चाचा जी उस समय कानपुर में नौकरी करते थे। एक बार घर आने पर उन्होंने अपने बैंक का फोन नम्बर पिताजी को यह कहते हुए दिया कि यह फोन हमारी टेबिल पर ही है अब सीधे बात हो जाया करेगी। हमने और हमारे छोटे भाई ने भी चाचा से उनका फोन नम्बर ले लिया।
हमने कक्षा 6 से कक्षा 12 तक की शिक्षा राजकीय इंटर कालेज से प्राप्त की है। इसके पास ही जिला चिकित्सालय है, जहाँ हमारी मामी उन दिनों नौकरी किया करतीं थीं। मामा-मामी चिकित्सालय के कैम्पस में ही रहा करते थे। हम अपने दोस्तों सहित लगभग रोज ही मामा-मामी के घर जाया करते थे।
इसी आवागमन के दौरान हमने एक दिन देखा कि चिकित्सालय में इंमरजेंसी वार्ड में एक फोन लगाया जा रहा है। हम लोगों के लिए बड़ी ही आश्चर्य की चीज थी वह फोन। अब मौका लगते ही हम लोग फोन को छूकर देख आते थे। अभी तक तो फोन अपने प्रधानाचार्य के कमरे में ही लगा देखा था या फिर मामी के आफिस में पर यहाँ कभी छूने को तो मिला नहीं था।
एक दिन मन में आया कि चाचा से बात की जाये। मामा से पूछा कि जो फोन यहाँ लगा है उससे बात कैसे होती है? मामा ने बताया कि उसमें नम्बर लिखे हैं, जिस फोन नम्बर पर बात करनी हो उनको घुमाओ और जब एक ट्रिन-ट्रिन जैसी आवाज सुनाई दे तो उसमें एक रुपये का सिक्का डाल दो। हमसे मामा ने पूछा कि कहाँ बात करनी है तो हमने कहा बस ऐसे ही जानकारी कर रहे थे।
अब समझ में आ गया था कि फोन कैसे करना है। वहाँ जाकर एक-दो नम्बर को घुमा कर ट्रिन-ट्रिन की आवाज भी सुन आये थे और अपनी छोटी सी जेबखर्च की राशि में से एक रुपया गँवा कर आवाज भी सुन आये थे। लगा कि अब चाचा से बात करनी आसान हो जायेगी। एक रुपये में जब चाहो चाचा से बात कर लो। खुशी तो बहुत थी पर ये मालूम नहीं था कि ये पब्लिक टेलीफोन है जो मात्र लोकल ही काम करेगा।
एक दिन चुपचाप फोन के पास पहुँचे, एक हथेली में चाचा की बैंक का नम्बर और दूसरी में एक का सिक्का दबाये। नम्बर घुमाये और इन्तजार कि अब ट्रिन-ट्रिन की आवाज सुनाई दे, नहीं सुनाई दी। एक बार, दो बार, तीन बार......फिर न जाने कितनी बार नम्बर घुमाया पर आवाज सुनाई नहीं दी।
पहले लगा कि शायद फोन खराब है। तभी एक आदमी ने आकर बात की तो लगा कि हम लोग ही गड़बड़ कर रहे हैं। अब हताश, हारे हुए सिपाही की तरह से बापस लौटे। दुख था चाचा से बात न हो पाने का फिर लगा कि कहीं गलत नम्बर तो नहीं लिख लिया? दिमाग दौड़ाते हुए घर आये, नम्बर देखा, एकदम सही।
घर में पिताजी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। अगले दिन कालेज से मामा के पास गये और अपनी समस्या बताई। मामा ने समझाया कि इस फोन से बस लोकल ही बात हो सकती है, एस0टी0डी0 नहीं। तब अपनी मूर्खता पर बहुत हँसी आई जो गाहेबगाहे आज भी फोन करने की बात सोच-सोच का आ ही जाती है। नादानी भले ही रही हो पर फोन करने का एहसास, फोन छूने का एहसास आज भी है।
फोन का वह एहसास भी है जब पहली बार फोन से बात की थी। इस बारे में बाद में।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

कार चलाना सीखा बिना किसी सहारे के

दीपावली के समय की बात है, आज से लगभग 12-13 वर्ष पहले। हमारे चाचाजी उस समय ग्वालियर में थे और अपनी कार से आये थे। उन्होंने उस समय कार नई-नई खरीदी थी। तब तक हमें कार चलानी नहीं आती थी। घर में पहली कार भी वही थी। अपनी पढ़ाई के दौरान ग्वालियर में कई दोस्तों के घर में कार थी पर सोचा करते थे कि जब अपने घर में कार आयेगी तभी चलाना सीखेंगे।
त्यौहारों पर सभी चाचा लोग यहाँ उरई में इकट्ठा होकर उन्हें हँसी-खुशी से मनाते हैं। अब माहौल भी उमंग भरा था और घर में कार भी खड़ी थी। हमने चाचा से कार सिखाने के लिए कहा तो चाचा ने कहा कि हमें सिखाते हुए डर लगता है तुम खुद सीख लो।
अब समझ नहीं आया कि क्या किया जाये? एक-दो दिन तो ऐसे ही ऊहापोह में गुजर गये। तीसरे दिन हमने और हमारे छोटे भाई ने हिम्मत करके कार की चाबी उठाई और घुस गये कार में। हालत ये थी कि न तो हमें कार चलानी आती थी और न ही हमारे छोटे भाई को।
इसके बाद भी हिम्मत करके चाबी लगाई, घुमाई और कार स्टार्ट। चूँकि हमारे घर के पास जगह कम होने के कारण कार सीधी तो आ जाती है पर जब उसे सड़क तक लाना हो तो बैक करके ही लाना होता है। कार चलाना सीखना भी था तो समझ नहीं आया कि अभी सीधे-सीधे तो चलानी आती नहीं है बैक कैसे करेंगे?
हम बैठे थे ड्राइविंग सीट पर और छोटा भाई बगल में। लगाया बैक गियर और कार धीरे-धीरे पीछे को जाने लगी। ऐसा अभी तक आराम से हो रहा था तो हिम्मत भी आ रही थी। जैसे-तैसे चार-पाँच बार कार के बन्द होने के बाद वह सड़क पर आ गई।
अब लगाया गियर एक और दबाया एक्सीलेटर पर गाड़ी रफ्तार ही न पकड़े। छोटा भाई कहें कि ब्रेक पर पैर न रखना, हमने देखा कि हम ब्रेक पर पैर भी नहीं रखे हैं पर गाड़ी अपनी रफ्तार में नहीं है।
लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये। कार को बन्द कर नीचे उतर आये। अबकी छोटा भाई ड्राइविंग सीट पर बैठा कार स्टार्ट और फिर वही स्थिति। कुछ समझ नहीं आया। तभी मोहल्ले के एक भाईसाहब निकले, हमने आवाज देकर उन्हें बुलाया और अपनी समस्या बताई। भाईसाहब ने एक पल की देरी किये बिना कहा कि देखो हैंडब्रेक तो नहीं लगा है?
अब पता तो था नहीं कि ये क्या बला होती है। भाईसाहब ने बताया और उस समस्या को दूर किया। अब कार अपनी असल रफ्तार पर थी। अब एक और समस्या, गियर लगायें तो उसी तरफ देखने लगें कि कौन सा लगा है और पता चले के कार सड़क के दूसरी ओर भागने लगे। फिर कार को सड़क के बीच में लायें और जब अगला गियर डालें तो फिर वही स्थिति। लगभग एक घंटे तक सड़क पर कार को हम दोनों भाई दौड़ाते रहे और सीख भी गये।
इस कार सीखने में अच्छाई यह रही कि हमने किसी को चोटिल नहीं किया। अगले दिन हम अपनी दादी, अम्मा, चाची को कार में बिठा कर पास के राध-कृष्ण मंदिर के दर्शन करवाने ले गये। भीड़ में कार चलाना सीखना और फिर परिवार के सदस्यों को घुमाने ने गजब का आत्मविश्वास ड्राइविंग को लेकर पैदा किया जो आज तक बना हुआ है।
चाचा की एक बात आज भी याद आती है जो उन्होंने हम लोगों के लौटने के बाद कही थी कि यदि तुममे कार चलाना सीखने की हिम्मत होगी तो बिना किसी सहारे के सीख लोगे, हम क्या कोई भी तुमको सिखा नहीं सकेगा। आज लगता है कि यह बात हर एक काम में लागू होती है।

बुधवार, 23 सितंबर 2009

जब सिनेमाघर में पहली फिल्म देखी

दसवीं कक्षा में आने तक कभी सिनेमाघर में फिल्म नहीं देखी थी उससे पहले नागौर जिले के मोलासर कस्बे में भरने वाले हिंडोला नामक मेले में प्रोजेक्टर के माध्यम से परदे पर खुले मैदान में दिखाई जाने वाली फिल्मे ही देख पाए था मेले में शहीदों पर व देश भक्ति की कई फिल्मे फ्री में दिखाई जाती थी मेले का प्रबंधन मोलासर निवासी प्रसिद्ध ओद्योगिक सोमानी परिवार द्वारा किया जाता है | चचेरा भाई हनुमान सिंह फिल्मो व फ़िल्मी गानों का शौकीन था उसने उस वक्त तक कई फिल्मे भी देख रखी थी वह अक्सर हमें फिल्मो की कहानियां व सिनेमाघरों के बारे में बताया करता था इस मामले में हम अपने आप को उसके सामने निरा बुद्दू ही समझते थे साथ ही हनुमान सिंह की प्रतिभा के कायल थे कि कैसे ये तीन तीन घंटे की पूरी फिल्मो की कहानी और डायलोग याद कर लेता है जबकि हमें तो एक प्रश्न का उत्तर याद करने के लिए कितनी रटत लगानी पड़ती है | हनुमान से फिल्मो की कहानियां व सिनेमाघरों की बाते सुनकर सिनेमाघर में फिल्म देखने की बड़ी जिज्ञासा होती थी |
आखिर दसवी कक्षा में पढ़ते समय ही हमें जीवन में पहली बार सिनेमाघर में फिल्म देखने का सोभाग्य प्राप्त हुआ और वह भी जयपुर के विश्व प्रसिद्ध सिनेमाघर " राजमंदिर सिनेमाघर " में | दसवी कक्षा में पढ़ते समय हमारी सरकारी स्कूल " राजकीय माध्यमिक विद्यालय ,खूड " के शिक्षकों ने हमें शेक्षणिक भ्रमण पर ले जाने का दो दिवसीय कार्यक्रम बनाया | कार्यक्रम के अनुसार हमारा दल खूड कस्बे से रवाना होकर सुबह अजमेर पहुंचा जहाँ दिन भर अजमेर भ्रमण के बाद हम शाम को तीर्थ राज पुष्कर पहुंचे | रात्री विश्राम के बाद सुबह पुष्कर सरोवर में स्नान कर ब्रह्मा मंदिर सहित अन्य मंदिरों के दर्शन कर हम जयपुर पहुंचे | दिन भर जयपुर आमेर आदि के दर्शन करने के बाद हमें रात ९ बजे राजमंदिर सिनेमाघर में फिल्म दिखाने के कार्यक्रम के तहत हमें राजमंदिर सिनेमाघर ले जाया गया | जीवन में पहली बार सिनेमाघर और वो भी प्रसिद्ध राजमंदिर में फिल्म देखने की उत्सुकता व रोमांच का जो अहसास उस वक्त हो रहा था उसे तो में सिर्फ महसूस ही कर सकता हूँ शब्दों में बयान नहीं कर सकता | लेकिन उस रोमांच के साथ मन में एक शंका भी उथल पुथल मचा रही थी क्योकि हनुमान ने बताया था कि राजमंदिर सिनेमाघर में ऐसे गलीचे बिछे है जिन पर पैर रखते ही पैर आधा फीट गलीचे के अन्दर धंस जाता है और समझो ध्यान नहीं रखा तो वहीँ धडाम | हालाँकि गलीचे पर गिरने से चोट तो नहीं लगेगी पर फजीहत तो होगी ही ना | उसने कुर्सियों के बारे में भी बताया कि बैठते ही फेल जाती है वहां भी धडाम होने से बचने हेतु सावधानी बरतनी पड़ती है |
गुरुजन साथ थे तो हमें अनुशासन में तो रहना ही था अतः सभी छात्रों ने एक लाइन बना सिनेमाघर में घुसने के लिए कदम बढाये | सिनेमाघर में घुसते ही वहां बिछे शानदार गलीचे पर बड़े संभल कर हमने कदम रखे कि हनुमान ने जो बता रखा था वो ना हो जाय यही नहीं सीट पर बैठते समय भी पूरी सावधानी बरती ! कही धडाम ना हो जाये और पूरी क्लास जिसमे होसियार बनते थे के सामने कहीं फजीहत ना हो जाये | खैर सीट पर बैठते ही फिल्म " सावन को आने दो " शुरू हो गयी | कब तीन घंटे बीते और कब फिल्म पूरी हो गयी पता ही नहीं चला | जब राजमंदिर सिनेमाघर से बाहर निकले तो अपने आप पर बड़ा फक्र हो रहा था आखिर हमने अपने जीवन में फिल्म देखने की शुरुआत राजमंदिर जैसे विश्व प्रसिद्ध सिनेमाघर से जो की थी | ;

बुधवार, 16 सितंबर 2009

लगे कि हर आदमी टिकट चेकर है

यह घटना एस समय की है जब लातूर में भूकम्प आया हुआ था। हम अपने छोटे भाई हर्षेन्द्र के साथ एक टेस्ट देने के लिए आगरा गये थे। रेलवे की परीक्षा थी, टेस्ट दिया और बापस चल दिये। हम लोगों को कानपुर आना था। टेस्ट देने के बाद हम लोग चले तो रेलवे स्टेशन पर पता लगा कि उस समय कानपुर के लिए कोई ट्रेन नहीं है। जानकारी करने पर मालूम हुआ कि आगरा से टुंडला पहुँच कर वहाँ से आसानी से कानपुर के लिए ट्रेन मिल जायेगी।
आगरा से टुंडला बस से आने के बाद रेलवे स्टेशन पहुँचे। आपकी एक शंका को दूर करने के लिए बताते चलें कि एक तो टेस्ट होने के कारण बसों में भीड़ बहुत थी दूसरे हमें बस की यात्रा तकलीफ ज्यादा देती है। इस कारण से हम ट्रेन से यात्रा करने की सोच रहे थे।
टुंडला स्टेशन पर जैसे ही पहुँचे पता लगा कि एक ट्रेन आ रही है। हालांकि ट्रेन थी पैसेंजर और कानपुर पहुँचना बहुत ही आवश्यक था। इस ट्रेन के बाद दो-तीन घंटे कोई ट्रेन भी नहीं थी। जल्दी से टिकट खिड़की पर पहुँचे तो वह समय सम्बन्धित बाबू की ड्यूटी बदलने का था तो वह अपने हिसाब किताब में व्यस्त था। ट्रेन सामने आती दिख रही थी। उससे बड़ी अनुनय-विनय की पर वह नहीं माना। अब लगा कि यह ट्रेन तो निकली। हमारे भाई ने प्लेटफार्म से आकर सूचना दी कि गाड़ी आकर खड़ी हो गई है। अब तो और भी हालत खराब।
पहले सोचा कि बिना टिकट ही चढ़ जायें पर कभी बिना टिकट यात्रा न करने के कारण से हिम्मत नहीं हो रही थी। सोचा-विचारी में समय न गँवा कर हमने तुरन्त सामने दरवाजे पर खड़े एक टिकट चेकर से अपनी समस्या बताई। उस ने बिना कोई तवज्जो दिये पूरी लापरवाही से कहा कि बैठ जाओ, पैसेंजर में कोई नहीं पकड़ता।
समझ नहीं आया कि क्या करें? सुन तो बहुत रखा था कि इटावा रूट पर चेकिंग नहीं होती पर वही हिम्मत की बात।
अन्त में अपने भाई की तरफ देखा और उस टिकट चेक करने वाले से एक बार और पूछा कि भाईसाहब कोई दिक्कत तो नहीं होगी?
शायद उसको लगा होगा कि कोई अनाड़ी हैं जो पहली बार बिना टिकट यात्रा करने की हिम्मत जुटा रहे हैं। इस बार उसने थोड़ा सा ध्यान हम लोगों की ओर दिया और कहा कि वैसे बिना टिकट जाने में कोई समस्या नहीं फिर भी यदि टिकट लेना है तो दो स्टेशन के बाद यह गाड़ी थोड़ी देर तक रुकती है, वहाँ से ले लेना।
बस हम दोनों भाई तुरन्त लपके क्योंकि गाड़ी भी रेंगने लगी थी। बैठ तो गये, सीट भी मिल गई पर....।
आने जाने वाला हर आदमी लगे कि टिकट चेक करने वाला आ गया। कभी इस तरफ देखें, कभी उस तरफ देखें। लगभग 55 मिनट की यात्रा के बाद वह स्टेशन आया जहाँ से टिकट लिया जा सकता था, हालांकि उसके पहले भी दोनों स्टेशन पर टिकट लेने का प्रयास किया गया पर असफल रहा।
अब सुकून आया और कानपुर तक आराम से आये। आज भी छोटी सी मगर बिना टिकट यात्रा याद है। हम दोनों भाई अब भी कभी-कभी उस समय की अपनी हालत की चर्चा करके हँस लेते हैं।

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

महाशोक: डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' नहीं रहीं-ये पोस्ट शब्दकार पर


महाशोक: डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' नहीं रहीं -acharya sanjiv 'salil

ये पोस्ट शब्दकार पर प्रकाशित है। इस ब्लॉग की प्रकृति के अनुसार न होने के कारण इसे यहाँ से निकाल दिया गया है।

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बार बार एक ही बात दोहराते हुए हमें भी शर्म आती है। आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे।