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मंगलवार, 25 मई 2010

केले के छिलके खाने को बेबस नौनिहाल देश के

इंसान की जिन्दगी में बहुत सी स्थितियाँ ऐसी होतीं हैं जब वह एकदम असहाय दशा में होता है और इस तरह की स्थितियों से बाहर आने के लिए वह कुछ भी कर बैठता है। ऐसी ही विषम स्थिति किसी भी व्यक्ति के जीवन में भूख के कारण आती है। कहा भी जाता है कि पेट जो न कराये वह कम है।

भूख में आदमी को दम तोड़ते भी सुना है, किसी भी स्थिति तक गिरते देखा है, चोरी करते सुना है, अपना जिस्म बेचते भी सुना है। भूख और गरीबी की विकट स्थिति से लड़ने-जूझने की, जिन्दा रहने की मारामारी में कुछ भी कर गुजरने के लिए उठाये गये कदमों में प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी के बारे में पढ़ रखा है कि वे किसी न किसी बहाने से पुलिस की पकड़ में आने की कोशिश करते थे। इससे उनके खाने और रहने की समस्या कुछ हद तक निपट जाया करती थी।

यह एक दशा है जो हमने पढ़ रखी है। कुछ इसी तरह की दशा से हमें रूबरू होने का कुअवसर उस समय मिला जब हम अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए सन् 1990 में ग्वालियर गये। हमारा रहना हॉस्टल में होता था और ग्वालियर में ही हमारे एक चाचाजी के रहने के कारण सप्ताह में एक बार उनके घर भी हो आते थे।

उरई जैसे छोटे से शहर से निकल कर ग्वालियर जैसे शहर में आने पर घूमने का अपना अलग ही मजा आता था। इसी कारण से चाचा के घर पर हमेशा रास्ते बदल-बदल कर जाया करते थे। एक दिन अपनी यात्रा के दौरान हमने रेलवे स्टेशन की ओर से जाने का फैसला किया। रेलवे स्टेशन के पास के ओवरब्रिज से चढ़ते हुए रेलवे स्टेशन का नजारा और सामने खड़े किले का दृश्य बहुत ही मजेदार लगता था। यह दृश्य अब ओझल हो चुका है क्योंकि अब दोनों ओर बड़ी-बड़ी इमारतों ने अपना स्थान जमा लिया है।

उस दिन जैसे ही ओवरब्रिज पर चढ़ने के लिए अपनी साइकिल को मोड़ा तो उसी मोड़ पर लगे कूड़े के ढ़ेर में एक बारह-तेरह साल का लड़का बैठा दिखा। ऐसे दृश्य अमूमन हमेशा ही किसी न किसी कूड़े के ढ़ेर पर दिखाई देते थे कि छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ कुछ न कुछ बीनते नजर आते थे। उस दिन भी कुछ ऐसा ही लगा किन्तु ऐसा नहीं था। वह लड़का बजाय कूड़ा-करकट बीनने के कुछ और ही करता नजर आया।

एक पल को झटका सा लगा, वह लड़का कूड़े के ढेर में पड़े केले के छिलकों को खा रहा था। दिमाग को झटका दिया और अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ाने के लिए पैडल पर जोर लगाया। मुश्किल से तीन या चार कदम ही साइकिल चल पाई होगी कि मन में उथल-पुथल मचने लगी। ब्रेक लगाये और वहीं खड़े हो गये अब न तो समझ में आये कि आगे बढ़ें या फिर इस लड़के के लिए कुछ करें।

अगले ही पल एक विचार किया और साइकिल को घुमा कर उस लड़के के पास खड़ा कर दिया। क्यों क्या कर रहे हो? की आवाज सुनकर उस लड़के के हाथ से केले का छिलका छूट गया, उसको लगा कि कहीं यह भी अपराध न कर रहा हो। उसके मुँह से कोई आवाज नहीं निकली, बस वह चुपचाप खड़ा हो गया।

हमने उससे खाना खाने के लिए पूछा तो उसने सिर हाँ की स्थिति में हिला दिया। उसको अपने साथ लेकर स्टेशन की बाहर ही तरफ बने होटलों की ओर ले गया। अब समस्या यह आनी थी कि उसको होटल में बिठाकर तो खिलाने को कोई भी तैयार नहीं होता। एक होटल में सोलह रुपये में एक थाली भोजन की मिलती थी। उससे एक थाली देने को कहा तो उसने बाहर देने से मनाकर दिया। इधर-उधर निगाह दौड़ा कर कुछ समाचार-पत्र और कुछ पॉलीथीन इकट्ठा किये और उस भूखे बच्चे के लिए भोजन प्राप्त किया।

तब से लेकर आज तक बहुत सी अच्छी बुरी घटनाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देखा-सुना है किन्तु आज भी वह घटना दिमाग से निकाले नहीं निकलती है। तब से लेकर आज तक एक नियम सा बना लिया है कि कभी भी माँगने वालों को, स्टेशन पर, ट्रेन में भीख माँगने वाले को, कूड़ा बीनने वाले बच्चों को कुछ रुपये देने की बजाय उनको खाना खिला देते हैं।

5 टिप्पणियाँ:

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत मार्मिक पोस्ट.... अंतर्मन को हिला दिया....

Rajeev Bharol ने कहा…

बहुत मार्मिक. काश मैं कुछ कर पाता.

एक पंजाबी के कवि की कविता याद आती है. भाव कुछ इस प्रकार थे: 'भूख तो मौत से भी बुरी है. मौत तो एक बार आती है लेकिन भूख? रात को खा कर सोता हूँ, सुबह फिर दरवाजे पर कड़ी मिलती है!'

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हां, ऐसे दृश्य देख कर खुद का पेट भरा होने पर अफ़सोस होता है. मार्मिक प्रसंग.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

रोज ना जाने कितने ऐसे गरीब बच्चे इसी तरह करते होंगे.. दिल भर आया पढ़कर.. आपका आभार कि आपने उसे खाना खिलाया चाचा जी..

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

कई बार हम खाना बर्बाद कर देते हैं... लेकिन हम अक्सर ये भूल जाते हैं कि इसे पाने के लिए कितने ही हाथ दिनरात मेहनत कर दो जून की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं