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सोमवार, 1 मार्च 2010

भांग खाकर भांग के नशे से बचते रहे

होली आई तो अपने भाँग खाने का एहसास याद आ गया। सबसे पहली बार भाँग हमने होली के ठीक चार दिन पहले खाई थी। हम उस समय साइंस कालेज, ग्वालियर में पढ़ा करते थे और छात्रावास में रह रहे थे। होली की छुट्टी होने वाली थीं और संयोग से छुट्टी के ठीक पहले रविवार पड़ा।
हास्टल में होता यह था कि मैस में रविवार को शाम की छुट्टी रहती थी और दोपहर के भोजन में पक्का खाना, सब्जी, पूड़ी, खीर, रायता, पापड़ आदि हम छात्रों को मिलता था। उस वर्ष हम कुछ छात्रों ने और हमारे दो-तीन सीनियर्स छात्रों ने विचार बनाया कि खीर में ही भाँग मिला दी जाये।
जैसा कि तय हुआ बिना अन्य किसी को बताये खीर में भाँग मिलाई गई। चूँकि हमारा सोमवार को एक प्रैक्टिकल था, इस कारण हमने खाना खाया और अपने कमरे में जाकर सो गये। इसके पीछे कारण ये था कि घर में कई बार सुन रखा था कि भाँग खाने के बाद आदमी का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रह जाता। वह जो भी कार्य करता है तो उसे बस करता ही जाता है। डर ये था कि कहीं हम कुछ गलत-सलत कर बैठे और प्रैक्टिकल न दे पाये तो बहुत बुरा होगा।
बहरहाल हमने तो सोकर भाँग के मजे लिये किन्तु हमारे अन्य दूसरे साथियों ने काफी हंगामा किया। इस घटना में हमने भाँग का पूरा आनन्द तो उठा नहीं पाया था, इस कारण हमें लगता रहा कि कभी भाँग खानी है और उसका असर देखना है। इसी ताक में लगे-लगे एक साल हमारे पड़ोस के त्रिपाठी चाचा ने भाँग को मेवे, खोआ आदि के साथ तैयार किया।
हमने भी उस मिठाई का आनन्द उठाया और इस बार उसका असर देखने के लिए सोये नहीं। अबकी बार मालूम पड़ा कि भाँग का मजा कैसा होता है।
हमने भाँग खाने के बाद खूब मीठा भी खाया क्योंकि सुन रखा था कि मीठा खाने से भाँग खूब चढ़ती है। दोपहर में खाना खाकर लेटे और कुछ देर बाद ऐसा लगा कि आज हमने खाना तो खाया ही नहीं। पलंग से उठे और सोचा कि मुँह धोकर अम्मा से खाना माँगा जाये। मुँह धोते-धोते एकदम से याद आया कि कुछ देर पहले भी तो हम मुँह धो रहे थे। हमने अम्मा से पूछा तो पता चला कि हम खाना खा चुके हैं।
हम फिर बापस पलंग पर जाकर लेट गये। दिमाग इस बारे में भी सचेत था कि कहीं हमारी हरकत से कोई ये न समझे कि हम नशे में ऐसी बातें कर रहे हैं, इस कारण हम चुपचाप लेटे रहे। इसके बाद भी भाँग अपना असर तो दिखा ही रही थी। मन में कभी आता कि ऐसा हो रहा है तो कभी लगता कि नहीं ऐसा नहीं हो रहा है।
होत-होते शाम हो गई, भाँग ने भी अपना असर कम नहीं किया। शाम को हम भाई अपने दोस्तों के साथ छत पर बैडमिंटन खेलते थे, उस शाम को भी खेले। खेलते समय हमें याद ही नहीं रहता था कि कब शाट मारा, कब प्वाइंट बने किन्तु खेलते भी रहे।
अन्त में एक बात समझी कि भाँग का नशा दिमाग की सक्रियता को कम करता है किन्तु यदि अपने पर नियंत्रण है तो वह आप पर हावी नहीं हो सकता। आज भी हम लोग बैठ कर उस दिन की भाँग खाने की और भी हरकतों की चर्चा कर हँस लेते हैं।
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सभी को होली की भाँग में लिपटी शुभकामनाएँ

1 टिप्पणियाँ:

वेदिका ने कहा…

अच्छा अनुभव है